Gangnath Mandir Part 1

Gangnath_Mandir_Part_1 Uttarakhand

उत्तराखंड में हिमालय की श्रेणियों में लाखों देवी देवताओं का निवास है और उन सभी देवी देवताओं की अपनी-अपनी परंपरागत बहुत सी कथाएं भी है। इसीलिए देवभूमि के नाम से कहे जाने वाले उत्तराखंड का इतिहास भी बहुत रोचक है। यहाँ की प्राचीन सभ्यताएं और कथाएं उत्तराखंड को और भी खूबसूरत बना देती है। बहुत से देवी देवताओं ने यही पर जन्म लिया था और वे अपनी शक्ति और कार्य कौशल्य से देवता के रूप मे पूजे जाने लगे। ऐसे ही एक देवता है जिनका नाम है, "गंगनाथ जी"। यह सुख-समृद्धि और "न्याय के देवता" के रूप में पूजे जाते है।

  • गंगनाथ मंदिर देवभूमि उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में ताकुला के पास सतराली गाँव में स्थित भगवान शिव के रूप “गंगनाथ देवता” को समर्पित हैं। यह मंदिर ताकुला के हरी-भरी वादियों के बीच में स्थित पर्यटकों को अपनी ओर अत्यधिक आकर्षित करता हैं।
  • गंगनाथ को स्थानीय लोगों द्वारा कुल देवता के रूप में पूजा जाता हैं एवम् गंगनाथ देवता को समर्पित अन्य मंदिर भी उत्तराखंड के अन्य जिले और क्षेत्रो में स्थपित हैं जैसी कि पिथौरागढ़ , नैनीताल और अल्मोड़ा आदि।
  • गंगनाथ मंदिर, पेड़ के हवाई जड़ों से शिवलिंग से निकलते पानी के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर खूबसूरत परिवेश के बीच में धार्मिक महत्व के रूप में प्रसिद्ध हैं।

 

 

उत्तराखंड के देवता गंगनाथ जी की कथा

गंगनाथ जी की यह कथा उस समय पर आधारित है, जब दिल्ली के शासक औरंगज़ेब थे। उस समय मुस्लिम धर्म का ज्यादा प्रभाव और प्रसार था। कुछ हिन्दु अपने धर्म की रक्षा के लिए हिन्दुस्तान के दूर प्रान्तों के छोटे-छोटे राज्यों में जा के शरण ले रहे थे। उस समय उत्तराखंड का जिला, अल्मोड़ा का एक राज्य हुआ करता था, जिसका कार्य क्षेत्र बहुत दूर तक था। उस समय अल्मोड़ा में चंद वंश के राजा चंद राज्य करते थे और  उस समय उन्होनें बहुत से मन्दिरों का निर्माण भी कराया। एक बार राजा चंद के पुत्र कि तबियत बहुत खराब हो गयी जिसके पश्चात वह हमेशा बिस्तर पर ही रहते थे। उनकी इस दशा को देख के राजा चंद और उनकी पत्नी दोनो चिंता में रहते थे। उसी समय एक जोशी ब्राह्मण अल्मोड़ा पहुंचे। वह  अपने धर्म कि रक्षा के लिए अपनी जन्मभूमि से दूर अपनी पुत्री भाना के साथ अल्मोड़ा आये थे।

जोशी जी को आयुर्वेद का अच्छा ज्ञान था। जब जोशी जी ने राजा के पुत्र की बिमारी की खबर सुनी तो वो राजा के पास गये और उनके पुत्र का उपचार करने को कहा। राजा ने अपने सभी वैदो की औषधि का उपयोग करके देख चुके थे और उस से उन्हें कोई भी फयदा होते हुए नजर नहीं आ रहा था। परन्तु जोशी की बातों में उन्हें थोड़ी आशा नजर आयी और राजा ने उन्हें अपनी पुत्र के उपचार की आज्ञा दे दी। जोशी जी ने पुरे 3 माह तक उनके पुत्र का उपचार किया और उस प्रकार धीरे-धीरे राजकुमार भी ठीक होने लगे। जिसके परिणामस्वरुप, जल्द ही राजकुमार अपने पैरो पे खड़े हो गये। यह देख कर राजा चंद और महारानी जी बहुत खुश हुए और उन्होनें जोशी जी को अपने राज्य में ही निवास करने की विनती की। यही नहीं, राजा चंद ने उन्हें अपने राज्य में मंत्री का पद भी दे दिया। इसके साथ ही, उन्हें पूरे राज्य में पूजा पाठ का काम देखने और करने की जिम्मेदारी भी दे दी। धीरे-धीरे राजा जोशी जी से राज काज के कामों में सलाह भी लेने लगे थे।

एक दिन राजा जी ने जोशी जी से कहा, "आप इतने दूर राष्ट्र से आये हैं, पर आप ने इस दूरी के बीच में पड़ने वाले इतने खतरनाक जंगल और जंगली जानवरों से अपनी रक्षा कैसे की?" जोशी जी ने कहा, "जैसे आपके पुत्र की रक्षा करने के लिए भगवान ने हमें इतनी दूर से आपकी सहायता के लिए भेज दिया, वैसे ही उसी भगवान ने हमें रास्ते की सभी कठिनाईयों से रक्षा के लिए एक वीर को भेज दिय़ा था। जिसने ना केवल हमारा मार्ग दर्शन किया बल्कि जंगल के जंगली जानवरों से मेरी और मेरी पुत्री के प्राणों की रक्षा भी की। हम उस वीर के सुरक्षा में होने के कारण ही आज जीवित है। वरना हम यहाँ तक पहुँच भी न पाते।" यह सुनकर राजा ने पूछा, "वह वीर पुरुष कौन है? हम भी उस वीर पुरूष से मिलना चाहेगें। हमें आपके साथ उनका भी धन्यवाद करना चाहिए क्योंकि आपको यहाँ लाने वाले वीर पुरुष तोह वही हैं।" जोशी जी बोले, "आपने सही कहा, राजन! उसका नाम गंगनाथ है और वह हमें जंगल में भटकते समय ही मिला था। उसके बारे में हम भी ज्य़ादा नहीं जानते क्योंकि हमारे पूछने पर भी उसने कुछ सही से नहीं बताया। लेकिन हम उसे आपके समक्ष जरूर ले कर आयेगें महाराज!" इतना कह कर जोशी जी अपने घर की ओर लौट गये। जैसे ही वह घर लौटे तभी उन्होंने भाना और गंगनाथ जी की बाते सुनी और सोच में पड़ गये। उनकी पुत्री भाना वीर गंगनाथ से प्रेम करने लगी थी और गगंनाथ जी भी उनकी पुत्री से विवाह करना चाहते थे। परन्तु जोशी जी इस रिश्ते को स्वीकार नहीं कर सकते थे। उन्हें लगने लगा जिस धर्म की रक्षा करने के लिए वो अपने जन्म स्थान को छोड़ के इतनी दूर आये है वो धर्म यहाँ आने के बाद भी उनकी पुत्री के कारण भ्रष्ट हो जायेगा। उनकी सोच यह थी कि किसी दूसरी जाति में अपनी पुत्री का विवाह होने से उनके धर्म की क्षति होगी। वह सोच में पड़ गए कि "ऐसा क्या करें जिस से कि उनके धर्म की रक्षा हो सकें।"

 

 

अगले दिन जोशी जी, गंगनाथ जी को अपने साथ राजा के पास गये। राजा ने गगंनाथ जी का स्वागत किया और धन्यवाद भी दिया। गंगनाथ जी के बहादुरी की किस्से सुनकर राजा ने उन्हें अपने राज्य में होने वाली वीरों की प्रतियोगिता के बारे में सुचित किया। राजा ने कहा, "हे वीर! हमारे राज्य में भी कुछ समय के अंतराल में वीरता दिखाने की प्रतियोगिता होती हैं, जिसमें हमारे राज्य से बहुत से वीर भाग लेते है। इस प्रतियोगिता में तीरंदाजी, तलवार बाजी, मूल्य-युद्ध और शेर से कुश्ती जैसे खेल होते है, जो प्राण धातक भी हो सके है। परन्तु, जो भी इस प्रतियोगिता का विजेता होता है, हम उसे अपनी सेना का सेनापति धोषित कर देते है। राजा के इतना कहने पर ही, जोशी जी को लगा उन्हें उनकी समस्या का हल मिल गया। उन्हें लगा शायद गंगनाथ जी प्रतियोगिता पूरा ना कर पाये और उनके प्राण की हानि हो जाये तो उन्हें भाना का विवाह उनसे नहीं करना पड़ेगा। गंगनाथ जी अभी थोड़ा विचार ही कर रहे थे कि जोशी जी बोल पड़े, "महाराज जी ! गंगनाथ  इस प्रतियोगिता में जरूर भाग लेगा और अपनी वीरता से आपको खुश कर देगा। गंगनाथ जी ने भी जोशी जी के शब्दों का मान रखते हुए प्रतियोगिता के लिए अपनी सहमति जता दी। गंगनाथ जी की प्रतियोगिता में भाग लेने की बात सुनते ही जोशी जी अपनी सारी चिन्ता से मुक्त हो गये और प्रतियोगिता की तैयारी में जुट गये।

जब यह बात भाना को पता चली तो भाना ने गंगनाथ जी को इस प्रतियोगिता से अपना नाम वापस लेने के लिए कहने लगी। भाना गंगनाथ जी के प्राणों को संकट में नहीं देखना चहती थी। भाना ने कहा, "अगर आप यह युद्ध मेरे लिए लड़ना चाहते हो तो उसके लिए युद्ध करने कि जरूरत नहीं है। हम दोनों कहीं भी जाकर अपना जीवन व्यतीत कर लेंगे। तब गंगनाथ जी ने कहा, "नहीं भाना! मैंने तुमसे प्रेम किया है, कोई अपराध नहीं, जो हमें भागना पड़े और जोशी जी भी बहुत अच्छे ह्रदय के व्यक्ति है। उन के प्रति भी आपका पुत्री होने का कर्तव्य है, जिससे आप भाग नहीं सकती। आप चिंता मत करो। हम स्वयं प्रतियोगिता के बाद जोशी जी से आपके और हमारे रिश्ते की बात करेगें।

परंतु भाना गंगनाथ जी की एक भी बात सुनने  को तैयार नहीं होती और उन्हें प्रतियोगिता में भाग लेने से शक्त मना कर देती है। भाना की व्याकुलता को देखते हुए गंगनाथ जी भाना से कहते है, "भाना! तुम अभी मेरे बारे में कुछ नहीं जानती हों। पर मुझे लगता है अब मुझे तुम्हें अपने बारे में सब बता देना चाहिए, पर तुम यह बात कभी किसी को मत बताना।

मेरा जन्म नेपाल के एक राज्य में एक राजा के परिवार में हुआ था। उस राज्य के राजा का मैं रिश्ते में भतीजा था। पर राजा के कोई पुत्र न होने के कारण उन्होंने मुझे ही अपने राज्य का उत्तराधिकारी धोषित कर दिया था। कुछ समय बाद राजा ने पुन: ही दूसरी शादी कर ली, जिसके फलस्वररूप दूसरी रानी को मेरा उत्तराधिकारी होना पसंद नहीं था। वह चाहती थी कि उनकी होनी वाली संतान ही राज्य का उत्तराधिकारी होनी चाहिए।

इसलिए उस रानी ने मुझे मारने के लिए बहुत प्रयास किये। एक बार उन्होंने हमें विष पिला कर नदी में फेंक दिया, पर होश आने पर मैं वापस अपने राज्य लौट आया। उसके बाद रानी ने हमारे कक्ष में जहरीले सांप छोड़ दिये जिन्हें हमने अपने पैरों से ही कुचल के मार दिया और जब हम आखेट खेलने जंगल में गये तो वहां भी कुछ रानी के विश्वशनीय सैनिकों ने मुझे अकेला देखकर मुझ पर आक्रमण कर दिया। उस समय तो मेरे पास तलवार भी नहीं थी, बस एक खुक्करी से ही मैंने सारे सैनिकों का वध कर दिया और अपने राज्य वापस आ गया। फिर भी रानी ने हार नहीं मानी और जब मैं अपने राज्य के सीमाओं के निरक्षण के लिए गया हुआ था तो रानी ने एक वीर योद्धा कोलवा डोटिवाल को मेरे पीछे लगा दिया और जब मैं डोटी की सीमा पर पहुंचा तो उस वीर योद्धा ने मुझ पर आक्रमण कर दिया। वह युद्ध पूरा 6 दिन और 6 रात तक चला और अंत में, मैंने कोलवा को परास्त कर ही दिया।

कोलवा ने मुझसे आग्रह किया कि मैं उन्हें अपना सेवक बना लूँ और उन्होंने मुझे रानी की सारी बात बता दी कि उन्हें मेरा वध करने के लिए रानी ने ही भेजा। पर मैंने उन्हें कहा कि वह रानी से कह दे उसने उनका काम पूरा कर दिया है, जिससे रानी आपसे खुश भी हो जायेंगी और आप हमारे राज्य की सेवा भी कर सकेगें। मैंने उन्हें बताया कि मैं राज्य छोड़ के जा रहा हूँ और आप चिंता ना करें, मैं अब कभी वापस नहीं आऊंगा। इतना कहकर मैं जंगल में चला गया। अपनी राज्य की सीमा से दूर और जंगलों में भटकते भटकते इतनी दूर कब पहुँच आया, मुझे पता ही नहीं चला और फिर एक दिन इसी जंगल में तुमसे मुलाकात हो गयी।

इसलिए, "हे भाना! तुम हमारी चिंता मत करो, मैं जरूर विजयी होऊंगा। मैंने कभी पीछे हटना नहीं सीखा, अब जब हमारा नाम प्रतियोगिता में शामिल हो ही चुका है तो मैं बिलकुल भी पीछे नहीं हट सकता। मैं कायर नहीं कहलाना चाहता। यदि जोशी जी मेरी परीक्षा लेना ही चाहते है तो मुझे यह प्रतियोगिता मंजूर है।“

 

 

यह सुनकर भाना रोने लगी और कहने लगी, "मेरे सौभाग्य से ही आप मुझे मिले हो और मैं आप को खोना नहीं चाहती।" तब गंगनाथ जी ने कहा, "तुम से मिलने के लिए ही शायद मैं इन जगंलो में भटक रहा था। मैं भी तुम से दूर नहीं रह सकता पर शायद जोशी जी हमें कभी विवाह की अनुमती नहीं देंगें।" तब भाना कहती है, "मैं बाबा को मना लुगीं और नहीं माने तो हम कहीं दूर चले जायेंगे।" गंगनाथ जी कहते है, "मैं अपने कर्म से पीछे नहीं हट सकता। तुम चिंता मत करो, मुझे कुछ नहीं होगा।" पर भाना फिर भी रोती ही रही।

अगले दिन प्रतियोगिता शुरू हो जाती है। गंगनाथ जी की वीरता के चर्चे पहले से ही पूरे राज्य में गूंज रहे थे। राजा भी जोशी जी से उनकी वीरता के किस्से सुन कर बहुत प्रभावित थे। इसलिए राजा ने ये धोषणा की कि सभी वीरों की प्रतियोगिता होने के बाद जो वीर सबसे शक्तिशाली होगा वो ही गंगनाथ जी से युद्ध करेगा। इस प्रतियोगिता को देखने के लिए पूरे राज्य से लोग दूर-दूर से आये हुए थे और भाना भी युद्ध देखने के लिए दर्शकों के बीच बैठी हुई थी।

राजा की आज्ञा देते ही प्रतियोगिता आरम्भ हो गयी। बहुत से वीरो ने इस प्रतियोगिता में भाग लिया और खूब वीरता से युद्ध किया। सभी दर्शक युद्ध देख के रोमांचित हो रहे थे और भाना घायल योद्धाओं को देख के रो रही थी। उन्हें गंगनाथ जी की चिंता हो रही थी। चारों ओर वीर योद्धाओं की जयकार गूंज रही थी। राजा भी वीरो की वीरता का सम्मान कर रहे थे। सभी वीरो के युद्ध समाप्त होने पर, राज्य के सेनापती ही विजय घोषित हुए। राजा के सेनापती ने सभी वीरो को युद्ध में पराजित कर दिया था। सेनापती भी वीरो में वीर था और सेनापती की युद्ध कौशल देख कर भाना और भी ज्यादा चिंतित हो रही थी और आँसू बहा रही थी।

पर गंगनाथ जी अपनी बारी आने का इंतजार कर रहे थे। जब सेना पति विजय हुए तो राजा ने सेनापति को गंगनाथ जी से युद्ध करने की आज्ञा दी। आज्ञा पाकर गंगनाथ जी युद्धभूमि में कूद पड़े। गंगनाथ जी को युद्धभूमि में आता देखकर चारों ओरर गंगनाथ जी की जय-जयकार गूंजने लगी। सभी गंगनाथ जी की वीरता से परिचित होना चाहते थे।

सबसे पहले तलवार बाजी का युद्ध प्रारंभ हुआ और दोनों ही वीर एक दूसरे पर तलवारों से प्रहारों की बारिश करने लग गये। युद्ध बहुत देर तक चला परंतु कोई परिणाम निकलता नजर नहीं आ रहा था। दोनों ही वीर युद्ध में कौशल थे और दोनों ओर से किसी भी गलती का होना असंभव ही था। परंतु अधिक समय हो जाने के बाद राजा के कहने पर तलवार बाजी के युद्ध को रोक कर मूल्य युद्ध कराने की आज्ञा दी गयी। दोनों वीर तलवार फेंककर कुश्ती करने लगे। दोनों ने अपने सभी दावों का प्रयोग किया और अभी भी दोनों में से कोई हारने को तैयार नहीं था। पर शायद सेनापती जी थोड़ा थक जरूर गये थे और अधिक रात्रि हो जाने के कारण राजा ने गंगनाथ जी को अभी तक के युद्ध का विजेता घोषित कर दिया और बाकि प्रतियोगिता अगले दिन के लिए स्थगित कर दी।