Sinhanaad

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रैंदि चिंता बड़ौं तैं बड़ा नाम की।
काम की फिर्क रैंदी, न ईनाम की।
‘राठ’ मा गोठ गौं को अमरसिंह छयो।
फ्रांस को लाम मा भर्ति ह्वै की गयो।
ज्यौं करी घर मूँ, लाम पर दौड़िगे।
फ्रांस मां, स्वामि का काम पर दौड़िगे।
नाम लेला सभी माइ का लाल को।
जान देकी रखे नाम गढ़वाल को।
शास्त्र मा कृष्ण जी को लिख्यूँ साफ छ।
धर्म का वास्ता खून भी माफ छ।
न्याय का वास्ता सैरि दुनिया लड़े।
भाइ तें भाइ को खून करनो पड़े।
आतमा अमर छ, बीर नी मरदन।
शोक ऊँ कू किलै खामखाँ करदन।
रणम करन से मिलदो स्वर्ग-धाम छ।
जीत ह्वैगे त होन्दो अमर नाम छ।
भार्या वे कि छै देवकी नाम की।
वा सती छै बड़ी भक्त ही राम की।
स्वामिजी तब बटी लाम पर ही रया।
चिट्ठी भी वो कभो भेजदा ही छया।
जब कभी स्वामि की चिट्ठी आंदी छई।
देवकी वींवीं सब्यूं मू पढ़ांदी छई।
चिट्ठी सुणी खुशी हूँदि दै देवसु।
स्वामि की याद से रुंदि छै देवकी।
सासु-ससुरा कि सेवा म रांदी छई।
कै का मुख पर नजर नी लगांदी छई।
स्वामि का नाम को व्रत लेंदी छई।
भूखा-प्यासौं तई भीख देंदी छई।
जब कभी स्वामि की याद आंदी छई।
रात-दिन रुंदि रुंदि बितांदी छई।
स्वामिजी छन म्यरा फ्रांस की लाम मा
घर छौं भी अफू लोलि आराम मा।
वो न जाणे कया कष्ट सहणा छन?
या कखी भूखा-प्यासा हि रहणा छन।
पेट-मोरी कि या भी नि खांदी छई।
रात दिन स्वामि की सोच रांदी छई।
एक दिन वो छया घर मु जब छया।
हैंसदा-खेलदा ही कना दिन गया।
भूख नी छै हमू प्यास नी छै कभी।
रात दिन प्रेम पूर्वक बितैने सभी।

 

 

हाय भगवान वे जर्मनी को मरे।
पापि न या किलै घौं लड़ाई करे।
साथ का लोग घर बौड़ि गैने सभी।
वो न जाणे लिै की नि ऐने अभी।
चिट्ठी भी भौत दिन से नि आई इख।
तब बटी कुछ खबर भी निपाई इख।
ऊँकि चिट्ठी किलैक नि आंदी होली?
काम से सैत फुरसत नि रांदी होली?
घर च जो अफू लोलि आराम मा-
वा क्या जाणो कि क्या बीतदीं लाम मा।
चैत भी बौड़ि बौड़ीक ऐगे इख।
देवकी बाठा देखो कि रेगे इख।
डांडि-कांठी सभी हैरि ह्वैने चुचों।
डालि-बूटी सभी मोलि गैने चुचों।
घुगति भी लाम से लौटि ऐने इख।
फूल कै भाति का फूलि गैने इख।
चन्द्रमा को जबौं लौअि ऐगे कभी।
रौतु को नौनु भी घर ऐगे अभी।
देवि दैव्तौं तई भी मनांदी छई।
रात दिन वा पुछारू पुछांदी छई।
पुछणु कू बाट का बट्बै मू गये।
औंदा जांदौं तई पूछदी वा रये।
रात दिन एक सी बितांदी छई।
हर घड़ी स्वामि की सोच रांदी छई।
पर लिख्यूँ भाग मा जोकि जैका रयो।
फिर वही अंतमा ह्वै कि रहणो छयो।
फ्रांस से मौत को तार छूटी गये।
”देवकी को बल-भाग फूटी गये“।

 

आदमी सोच दो त बड़ी दूर छ।
हून्द वी जो विधाता कु मंजूर छ।
वैन जो कुछ करे न्याय, सहणो पड़े।
सबकु मजबूर चुपचाप रहणो पड़े।
रोज दुखः सुख इथा? आप सहणा छवाँ।

 

एक दिन, जब जरा घाम छौ धार मा।
रूम्कै पड़णी छई सैरि संसार मा।
बोण का गोरु जब घअर आणा छया
पंछि अपड़ा बसेरों मु जाणा छया।
गौंकि सब बेटि-ब्बारी मि धाणी बटी।
रमकदी-झमकदी घास-पाणी बटी।
क्वीं थकीं, क्वीं डरीं, क्वीं कणाणी छई।
भारि कै बै करी घअर आणी छई।
घअर मू कैकि सासु खिजेणी छनअ।
जो नि देणो इनी मैकि देणी छनअ।
क्वो करवी दूदिको नोनु रोणू छयो।
यां परै द्वी झणों झगड़ा होणू छयो।
क्वी पंदेरी पंदेरा मु आणी छई।
वाजि लमडेर, जन्दी लगाणी छई।
कुटणु कू ब्वारि-भारी ल्हि जाणी छनअ।
क्वी झणो गौड़ि-भैंसी पिजाणी छनअ।
ज्वान जोरा तमाखू उडाणा छया।
बूड-बुड्डया मि बरड़ांद जाणा छया।
मौज हूणी छई इनि जबारी उखअ
काबुली एक ऐगे तबारी उखअ।

 

लम्बु भारी बदन एक चोला छयो।
हींग देंदो रुप्ये एक तोला छयो।
कैरणी आंखि, मैलो-कुचैलो बड़ो।
भूत-सी, ऐकि सोंदिष्ट ह्वेगे खड़ो।
आज तक जो क्या सूणि छै जै न भी।
भूत सैंदिष्ट देखी नि छो कैन भी।
देखि तै छोटा छोरा भग्या रात मा।
आज क्या हूणि-जाणी ण, परमात्मा।
नौनु व ेदखि; की एक रोये जबअ।
बूड-बुड्यों को यो हुक्म होये तबअ।
रात रहणू जगा तै नि देलो कईअ।
नौनु सैंल्यूं-पल्यूं जी छले लो कुई।
दूर गौं से अलग एक कूड़ो छयो।
घअर, तैं रात बती आदमी नी रयो।
देवकी एक विधवा विचारी छई।
वा अफी पापि किस्मत कि मारी छई।
स्वामि का नाम को व्रत ल्हेंदी छई।
भूखा-प्यासों तई भीख देंदी छई।
चौक मा काबुली पोंछि ऊंका गये।
पापि बाकारुणा कैकि रोणू रये।
”दीदि! देदे जगा आज की रात ही।
फेर चलि जौलु मी मोल-परभात ही“
भोलि-भालि, कपट-छल नि जणदी छई।
हौरू को दिल भि अपणों-सि गणदी छई।
छै दयावन्ति घ्ज्ञरकी अकेली रई।
खालि छो ओबरो बोड रांदी छई।
ओबरा का किनारा जगा रात मा
पेट भोरी मिले खाणु भी साथ मा।

 

 

जबकि संसार समसूत ह्वेगे छई।
कुक भुकणा छया दूर, गौं मा कई।
गाड-गदरों कु स्वीं स्याट होणू छयो।
सालि का मूड़ि की स्याल् रोणू छयो।
सैरि संसार आराम पाणी छई।
नींद पर काबुली तैं नि आणी छई।
खड़-उठी वो, सुरक भैर आणू छयो।
बौड की देलि भू बैठि जाणू छयो।
आंदो-जांदो छयो द्वार भी खेल दो।
देकि धक्का, छयो रोष मा बोल दो।
जो भलो चांदि तब खोलिदे द्वार तू।
खांमखां केकु खांदी म्यरी मार तू?
दूर छौ गों, विचारी अकेली रई।
क्या करो? वेकि सब बात सुणणी छई।
रुन्दि छै भारि, धिडुड़ी सि रिटणी छई।
भांडा-कूंडा लगै द्वार किटणी छई।
काबुली भैर, भीतर छई वा खड़ी।
नी खुल्या द्वार जब देर ह्वेगे बड़ी।
भाग-सेद्वार भी एक कच्चो रये।
फेर भीतर की सांकल भी टूटी गये।
जबकि-कैको बुरो वक्त आंदअइण अ।
खून भी वैकु आपड़ो नि रांदअ इखअ।
अपड़ि छाया जु रहंदी सदा साथ मा।
साथ नी रैंद वा भी चुचों, रात मा।
मिरग पर बाण मरदअ शिकारी जबअ।
खून ही पेड़ अपड़ी बतान्दअ तबअ।
लाल आंखी करी, छौ छुरा हाथ मा।
पौंछिगे काबूली क्रोध का साथ मा।

 

वीन बोले-अरे, भैर जा, मान तू।
खांमखां खुंदि अपड़ी किलै ज्यान तू?
खूंदु छै उख, जखी खांदु छै गास तू।
कै मुलक को छई चोर-बदमाश तू?
तू सियीं-सिंहणी तैं जगाणू छई
आगि पर हाथ-केकू लगाणू छई।
पर नि मान्यो कतै, वीं डराणू रये।
होरि डडो पकड़णू कु आणू रये।
स्वामि सुमरी, उठी बात की बात पर।
खैंचि खुंकरी सिंराणा बटी हाथ पर।
मूलिगे क्या च वा, नी रई होश मा।
भूखि-सी सिंहणी वा छुटे रोश मा।
क्रोध से वे परैं ब्रज-सी टूटिगे।
हाथ से काबुली को छुरा छूटिगे।
बिजली-सी रात खुकरी चमकणी छई।
आग-सी तन बदन वीं का जगणी छई॥

 

शब्दार्थ
शब्द अर्थ शब्द अर्थ शब्द अर्थ
ब्बे माता-पिता रमकदी-झमकदी झूमती सैंल्यूं-पल्यूं पाला-पोसा
बटी से भारि कै जल्दी-जल्दी लो भूत लगना
तई को खिजेणी धमकाना कूड़ो मकान
म्यरा मेरा नोनु बच्चा बाकारुणा फूट-फूट
बौड़ि लोट गये झणों जन ओबरो नीचे का हिस्सा, मकान का
सैत शायद पंदेरी पनिहारिन बोड ऊपर का हिस्सा
धार पहाड़ी वाजि काई समसूत गहरी नींद
रूम्कै शाम लमडेर आलसी गाड नदी-नाले
सैरि सारा जन्दी चक्की सालि गौशाला
बोण बन पिजाणी दोहना मूड़ि नीचे
बेटि-ब्बारी बहुएं बरड़ांद बड़बड़ाना धिडुड़ी पक्षी
धाणी काम कैरणी कंजी रिटणी चक्कर
बटी से सोंदिष्ट सामने होरि और

 

उतराखण्ड की माटी ने सदियों से अनेकों अनेक वीरों को जन्म दिया है। एक से एक वीर- बहादुर सैनिकों की वीरता की गाथाओं से उतराखण्ड का इतिहास भरा पड़ा है।
अपने घर - प्रदेश से दूर , जब एक सैनिक अपने परिवार सगे- सम्बन्धियों को भुलाकर देश की खातिर अपने प्राणों की आहुति के लिए सदैव तत्पर रहता है तब उसके परिवार, जीवन संगनी पर क्या गुजरती है। इसका जीवंत और मार्मिक चित्रण कवि ने गढ़वाली भाषा अपनी कविता के माध्यम से किया है। उसी का हिन्दी रुपान्तरण सभी तक पहुँचने के लिए किया गया है।

कवि अपनी मातृभूमि अपने गढ़वाल देश की धरती को सम्बोधित करता हुआ कहता है" हे,गढ़ देश की धरती सर्वप्रथम तुझे शत - शत प्रणाम है ।हम सभी प्रदेशवासियों पर तेरी बड़ी असीम दया दृष्टि है।तुम्हारी दया दृष्टि व कृपा से ही हमें हर प्रकार से सुख - सम्पन्नता प्राप्त है। तुमने ही तो इस पवित्र माटी को अनेकों-अनेक वीरों की फौज दी है।

 

 

पहले उन्नीस सौ पन्द्रह के सात समन्दर पार जर्मनी और फ्रांस के घोर युद्ध में देश,जाति ,और अपना कर्तव्य निर्वाहन हेतु अपने माता-पिता सगे-सम्बन्धियों को छोड़ देश की खातिर सरकारी आदेश के पालन हेतु युद्ध के लिए जहाज में बैठ गये।(तत्कालीन बिर्टिश साम्राज्य के अंतर्गत फ्रांस की ओर से लड़ने वाली 39 गढ़वाल राइफल्स के शहीद भारतीय वीर सैनिकों की याद में' नूवे शेपल' नामक स्थान पर 1927 में एक युद्ध - स्मारक बनाया गया है। जहाँ हाल ही में माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी ने उन सभी शहीद बहादुर सैनिकों को श्रर्द्धाजंलि अर्पित की। नूवे शेपल का युद्ध भारतीय सैनिकों के योगदान के लिए खासतौर पर जाना जाता है।इस युद्ध मे विशिष्ट वीरता के लिए 6 गढ़वाली सैनिकों को मिलिट्री क्रास से अंलकृत किया गया। प्रथम विश्व युद्ध के वक्त गढ़वाल राइफल्स को 31 गढ़वाल राइफल्स के नाम से जाना जाता थ। प्रथम विश्व युद्ध में गढ़वाली सैनिकों की वीरता से प्रभावित होकर तत्कालीन बिर्टिश सरकार ने इसका नाम " 39 रायल गढ़वाल राइफल्स कर दिया था। आजादी के बाद इसमें से रायल शब्द हटा लिया गया।

फ्रांस के युद्ध में नायक दरबान सिंह नेगी और राइफल मैन गबर सिंह नेगी को उनकी बहादुरी के लिए मरणोपरांत विक्टोरिया क्रास से सम्मानित किया गया। जबकि संग्राम सिंह नेगी को मिलिट्री क्रास अवार्ड् से नवाजा गया।
कर्तव्य निर्वहन के लिए वे लोग अपने सगे-सम्बन्धियों, माता-पिता को भी अकेला छोड़ सात - समन्दर पार की लड़ाई के प्रस्थान कर गये थे।

फ्रांस की धरती , उस समय जो खून से लाल हो गयी थी।वहाँ वे लोग अपने खून से गढ़वाल का नाम अमिट कर गये।उन्हें सिर्फ कर्तव्य निर्वाहन की,नाम खराब न हो इसी बात की चिन्ता थी। न कि किसी इनाम की। 1918 तक चले प्रथम विश्व युद्ध में विभिन्न मोर्चों पर गढ़वाल राइफल्स के कुल 721 जवान शहीद हुए थे। अधिकारिक आकड़ों में तो इस युद्ध में साढ़े चार हजार भारतीय जवान मारे गये थे। कुछ भाग्यवान ही वापिस लौटकर आ सके थे।इन्ही सैनिकों में एक गोठ गाँव का एक नौजवान अमर सिंह भी था। फ्रांस की लड़ाई के दौरान भर्ती होकर सीधे सरकारी आदेश के पालन हेतु सात समुन्दर पार चला गया। उस बहादुर नवयुवक का सभी गर्व से नाम लेंगे जिसने अपने प्राणों की आहुति देकर गढ़वाल का नाम अमर कर दिया।
शास्त्रों में कृष्ण भगवान ने कहा है कि धर्म के लिए अपनों से भी युद्ध करना,न्याय के लिए सारी दुनिया से लड़ना पड़े तो भी न्याय संगत है। आत्मा अमर है वो कभी नहीं मरती।इसी प्रकार वे वीर सैनिक भी अमर है जो मातृभूमि की आन-बान हेतु अपने प्राणों की आहुति दे देते हैं। ये संसार व्यर्थ ही उनके लिए शोक करता है। न्याय और धर्म- युद्ध के लिए मृत्यु होने पर भी स्वर्गधाम की प्राप्ति होती हैऔर विजय मिले तो नाम अमर हो जाता है।

इसी नौजवान की पत्नी थी देवकी वो सती-सावित्री भगवान राम की बड़ी भक्त थी। उसके स्वामी(पति) तब से लाम(लड़ाई)पर ही थे। कभी-कभार ही उनकी चिट्ठी आती थी तो देवकी सभी से उसे पढ़वाती थी। चिट्ठी मे लिखी बातें सुनकर देवकी खुश हो जाती थी और देवी-देवताओं का आभार व्यक्त करती थी। कभी-कभी देवकी अकेले स्वामी की याद मे रोती थी तो भी वो अपने सास-ससुर की सेवा में लगी रहती थी। किसी की भी तरफ नजर नहीं उठाती थी। वो पतिवत्रा नारी अपने पति के लिए व्रत रखती थी।कोई भूखा-प्यासा फिर कोई माँगने वाले को भी खाली हाथ नहीं जाने देती थी। जब कभी उसे अपने स्वामी की याद आती थी तो उसका रात- दिन रोते हुए ही बीतता था। मन ही मन कहती मेरे स्वामी परदेश फ्रांस के युद्ध में गये हैं उन्हें न जाने कौन-कौन से कष्ट उठाने पड़ रहे होगें ?या फिर कहीं भूखे-प्यासे ही रह रहे होगें ?और मै यहाँ आराम से भरपेट खाकर आराम से रह रही हूँ यही सोचकर वो कई-कई दिन भूखी रह जाती थी।

 

 

रात-दिन पति की ही सोच (चिन्ता) में रहती थी। अपने पुराने गुजरे हुए दिनों को याद करते हुए कहती है कि वे दिन भी क्या दिन थे जब वे घर पर थे हँसते-खेलते कैसे दिन गुजरता पता ही नहीं चलता था। न ही कोई चिन्ता- फिक्र , न भूख-प्यास थी। रात-दिन प्रेम पूर्वक गुजर रहे थे।अपने भोलेपन में जर्मनी के शासकों को कोसते कहती है, "हे भगवान इनको(जर्मनी के शासकों)मौत आ जाए।पापी देश ने क्यों लड़ाई करी?

साथ के सभी लोग घर वापिस आ गये हैं वे न जाने क्यो अभी तक लौटकर वापिस नहीं आये।उनकी चिट्ठी भी बहुत दिनों से नहीं आयी है।तब से उनकी कोई खैर-खबर भी नहीं आयी है। उनकी चिट्ठी क्यों नहीं आ रही होगी?फिर अपने मन को समझाते हुए कहती है उन्हें काम से फुरसत नहीं मिल पा रही होगी। मैं तो यहाँ आराम से हूँ उन पर लड़ाई में जाने क्या-क्या बीत रही होगी?

चैत ऋतु भी लौट आयी है देवकी रास्ता देखते रह गयी। यहाँ ऊँची-नीची पहाड़ियों पर हरियाली छा गयी है सभी पेड़-पौधे पर नई-नई कोपलें , नये -नये पत्ते आ गये हैं घुगती (एक पहाड़ी चिड़िया) भी लौट आयी है यहाँ विभिन्न प्रकार के फूल भी खिल गये हैं चन्द्रमा की रोशनी भी अब पूरी हो गयी है अर्थात पूर्णिमा भी आ गयी है रावतों का लड़का भी वापिस घर आ गया है। देवकी , देवी- देवताओं की मनौती मनाती थी(पूजा-अर्चना)भी करती थी। वो रात-दिन बक्की(भविष्य वक्ता /झाड़-फूँक) से भी पूछवाती(अपने पति की कुशल- क्षेम के बारे में) आते-जाते वो उससे पूछती रहती थी। हर घड़ी हर पल अपने पति की सोच में रहती थी परन्तु भाग्य में जिसके जो लिखा होता है अन्त में होता वही है।

फ्रांस से तभी उसके पति की मौत (शहादत ) का तार चल पड़ा। देवकी का तो जैसे भाग्य ही फूट पड़ा। आदमी की सोच तो बहुत दूर की बात है होता वही है जो विधाता को मंजूर होता है। वो जो न्याय करता है हँसकर या फिर रो कर वह सहना ही पड़ता है। मजबूर होकर चुपचाप सहन करना ही पड़ता है रोज का सुख-दुःख यहीं इस धरा पर ही भुगतना पड़ता है।

एक दिन जब धूप ढलने को थी।शाम धीरे-धीरे गहराती जा रही थी। जंगल मे चरने गये पशु भी घरों को लौट रहे थे। पंछी भी अपने-अपने घौसलों को लौट रहे थे। गाँव की बहु-बेटियाँ खेतों सेअलसाती हुई , घसेरी घास लेकर , पन्देरी
पानी लेकर, कोई सास की डाँट से डरी हुई , कोई दिन भर काम के थकान से कराहती हुई अपने- अपने घरों को लौट रही थीं तो किसी के छोटे बच्चे के रोने की आवाज आ रही थी। किसी घर से सास की बहु को डाँटने और बड़बड़ाने की आवाजें आ रही थी। कोई बहु-बेटी कूटने के लिए अनाज लिए हुए ओखल की तरफ जा रही थी। कुछ गाय-भैंस का दूध दुह रही थी।कुछ बड़े-बूढ़े हुक्के से तम्बाकू पी रहे थे तो कुछ बूड़-बूड्डया(बड़े-बूढ़े) कुछ बड़बड़ा रहे थे जब उस गाँव मे ऐसी मौज हो रही थी तभी वहाँ एक लम्बा-चौड़ा आदमी मैले-कुचले कपड़ों में कैरणी(सफेद आँखों)वाला भूत सा दिखने वाला एक फेरी वाला आकर सामने खड़ा हो गया। जो कि एक रुपया तोला हींग बेच रहा था। आज तक जिसने भी केवल सुना ही था देखा नहीं था कि भूत होता है। आज साक्षात भूत खड़ा था। यदि कोई छोटा बच्चा देख ले तो डर के मारे वो बेहोश ही हो जाता। जब कभी रात को बच्चा रोता है तो बड़े कहते है कि चुप कराओ वरना भूत लग जायेगा। वैसे भी बड़े-बूढ़े कहते हैं कि रात में किसी को भी (खासकर किसी अपरिचित को)ठहरने/रुकने के लिए जगह नहीं देनी चाहिए।

 

 

देवकी का मकान गाँव से दूर एकांत स्थान में था। घर में कोई आदमी न था।देवकी एक विधवा बेचारी किस्मत की मारी जो अपने पति के नाम का व्रत रखती थी। माँगने वालों को , भूखे-प्यासे को खाना इत्यादि देती रहती थी। उसके चौक (आँगन में)वो फेरी वाला पहुँच गया। पापी,फूट-फूट कर रोकर कहने लगा, "दीदी आज की रात रुकने की जगह दे दो फिर सुबह ही मैं चला जाऊँगा। भोली-भाली ,निश्चल देवकी छल-कपट से अनभिज्ञ थी औरों को भी अपने जैसे ही समझती थी। वो दयावन्ती नारी उस समय घर में अकेली थी उसके घर का उबुर (नीचे का कमरा ) खाली था। ऊपर वाले कमरे में वो रहती थी। नीचे का कमरा उसे मिल गया साथ ही भरपेट खाना भी मिल गया।

जब सारा संसार(गाँव) गहरी नींद में सो गया। दूर गाँव से कई कुत्तों की भौंकने की आवाजें आ रही थी।गोशाला के नीचे की तरफ से स्याल(सियार )के रोने की आवाज़ आ रही थी। दूसरी ओर गाड-गदेरों(नालों)से पानी की सुस्याँट(शोर) की आवाजें आ रही थी। जहाँ सारा गाँव गहरी नींद में था वहीं वो फेरी वाला जाग रहा था उसे नींद नहीं आ रही थी। वह चुपचाप उठकर बाहर आ गया और ऊपर कमरे की देहरी पर बैठ गया। बार-बार दरवाजे को धक्का दे रहा था और क्रोधित होकर कह रहा था कि दरवाजा खोल दे व्यर्थ ही क्यों तू मेरी मार खाना चाहती है। गाँव दूर था वो बेचारी अबला नारी करे भी तो क्या? भयभीत उसकी सब बातें सुन रही थी और रो रही थी घ्वड़ी की तरह (डरी हुई हिरनी सी)इधर-उधर टहल रही थी।डर से सहमी हुई देवी- देवताओं से अपनी रक्षा की गुहार मन ही मन कर रही थी। कह रही थी हे परमात्मा! हे देव! आज रात न जाने क्या होने वाला है? डर से उसका दिल बैठा जा रहा था। बर्तन इत्यादि उसने दरवाजे से सटाकर रख दियेऔर दरवाजे को बन्द किये हुए थी। बाहर वो दुष्ट फेरीवाला अन्दर वो अकेली बेचारी।

जब बहुत देर तक दरवाजा नहीं खुला तो वो दरवाजे को कँधे से जोर-जोर से धकेलने लगा। देवकी के दुर्भाग्य से एक दरवाजा कमजोर था फेरी वाले जोर से अन्दर की साँकल टूट गयी। किसी ने ठीक ही कहा है कि जब बुरा वक्त आता है तो अपना खून भी पराया हो जाता है।अपनी छाया भी जो हर समय साथ रहती है वो भी रात के वक्त साथ छोड़ देती है। जब शिकारी मृग(हिरन)पर बाण चलाता है तो उसका खून ही उसकी पीड़ा बतलाता है। छुरा हाथ मे लिए लाल आँखें किए हुए क्रोध में वो बदमाश अन्दर घुस गया।

तब डर और गुस्से से काँपती हुई देवकी बोली," अरे दुष्ट क्यों तू गड्डा खोद रहा है? जहाँ तूने खाया-पीया है। व्यर्थ ही क्यों अपनी जान देने पर तुला है? किस देश का है रे तू दुष्ट? चोर!बदमाश! तू क्यों सोई हुई शेरनी को जगा रहा है?क्यों तू आग को हाथ लगा रहा है?परन्तु वो फिर भी नहीं माना देवकी को छुरा दिखाकर डराता रहा। तभी देवकी को लाम(लड़ाई) पर गये हुए अपने स्वामी की याद आयी उसने झट से सिराहने के नीचे से खुकरी खींच हाथ मे ले ली। देवकी के हाथ में खुकरी बिजली की भाँति चमक रही थी। वो भूल चुकी थी कि वो कौन है?क्या है? उसके तन-बदन में आग लगी थी। क्रोधित हो वह शेरनी की भाँति उस दुष्ट बदमाश पर टूट पड़ी और उसकी गर्दन एक ही झटके मे उतार दी। तब उसका शरीर धड़ाम से नीचे गिर गया। देवकी ने उस दुष्ट का काम तमाम कर दिया ।

 

Bhajan Singh