Khuded Beti

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बोड़ि-बोड़ी ऐगे ब्वै। देख। पूस मैना। गौंकि बेटो ब्वारि ब्वै। मेतु आइ गैना
मैतुड़ा बूलालि ब्वै। बोइ होलि जौंकी। मेरि जीकूड़ी म ब्वै। कूयड़ी सि लौंकी।

मूल्वड़ी वासलि ब्वै। डाड्यूं चैत मासज। भौलि गैने डालि ब्वे। फूलिगे बुरांसज।
माल की धूगति ब्वै। मैत आंदि होली। डाल्युं मां हिलांस ब्वै। गीत गांदि होली।

ऊलरि मैनो कि ब्वै। ऋतु बोड़ि ऐगे। हैरि ह्वेने डांडि ब्वै। फूल फूलि गैने।
घूगती घुरलि ब्वै। डाल्यूं-डाल्यूं मांजअ। मैतुड़ा बुलालि ब्वै। बोह होलि जौंकी।
मेरि जीकूड़ी म ब्वै। कूयड़ी-सि लौंकी॥

लाल बअणी होलि ब्वै। काफुलू कि डाली। लोग खान्दा होला ब्वै। लूण रालि राली।
गौंकि दीदी-भूलि ब्वै। जंगुल न जाली। कंडि मोरि-मोरि ब्वै। हींसर बिराली।
‘बाडुलि लागलि ब्वै। आग भभराली’। बोई बोदि होलि ब्वै। मैत आलि-आली।
याद ओंद मीत ब्वै। अपड़ा भुलौंकी। मेरि जोकूड़ी म ब्वै। कूयड़ी-सि लौंकी॥

ल्हालि कूरो गाडिब्वै। गौं कि बेटि-ब्वारी। हैरि-भरीं होलि ब्वै। गेंउ-जो, कि सारी।
यं बार मैनों कि ब्वै। बार ऋतु आली। जौंकि बोई होलि ब्वै। मैतुडा बुलाली।
मैतु ऐ-गै होलि ब्वै। दीदि-भूलि गौंकी। मेरि जीकूड़ी म ब्वै। कूयड़ी-सि लौंकी॥

स्वामिजी हमेशा ब्वै। परदेश रैने। साथ का दगड़या ब्वै। घअर आइ गैने।
ऊंकु प्यारी ह्वेगि ब्वै। विदेशू को वासअ। बाठा देखी-देखी ब्वै। गैनि दिन-मासअ।
बाडुलि लागलि ब्वै। आग भभराली। या त घअर आला, ब्वै। या त चिट्ठिं आली।
चिट्ठि भी नी आइ ब्वै। तब बटी तौंकी। मेरि जीकूड़ी म ब्वै। कूयड़ी-सि लोंकी॥

बाबजी भी मेरा ब्वै। निरमोही रैने। जौन पाथो भोरि ब्वै। मेरा रूप्या खैने।
गालि देंद सासु ब्वै। मैं-बाबु कि मारी। बासि खाणू देंद ब्वै। कोलि मारी मारी।
बोद तेरो बाबु ब्वै। जो रूपया नि खांदो। मेरो लाड़ो-प्यारी ब्वै। विदेशू नि रांदो।
बाबा न बणये ब्वै। इनि गति मेरी। ज्वानि तअ उड़िगे ब्वै। वाठो हेरी-हेरी।
चिट्ठी भी नी आइ ब्वै। तब बटी तौंकी। मेरि जीकूड़ी म ब्वै। कूयड़ी-सि लौंकी॥

 

 

शब्दार्थ
शब्द अर्थ शब्द अर्थ शब्द अर्थ
बोड़ि लोट-लौट कर लौंकी छाया गया भभराली शब्द होना
ब्वै माँ मूल्वड़ी पक्षी विशेष ल्हालि कूरो एक प्रकार की घास
मेतु मायका डाड्यूं पहाड़ों सारी खेत
मैतुड़ा मायका काफुलू फल विशेष दगड़या दोस्त
बोइ माँ मोरि-मोरि मिला-मिला कर पाथो माप विशेष
जीकूड़ी हृदय हींसर फल विशेष मैं-बाबु से
कूयड़ी कुहरा बाडुलि स्मृति की हिचकियां जीकूड़ी हृदय


'खुदेड़ बेटी' कविता में कवि ने मायके की याद में तड़फती एक बेटी का गढ़वाली भाषा मे बड़ा ही हृदय विदारक एवम् मार्मिक चित्रण किया। जिसको पढ़कर ही आँखें बरबस नम हो जाती हैं।
बेटी अपने ससुराल में है जिसकी माँ अब नहीं हैं उसके मायके में भाई-भावज हैं परन्तु वे उसकी खैर-खबर नहीं लेते ।

एक बेटी अपने ससुराल में माँ को याद करते हुए कहती है माँ, 'ये पौष का महिना फिर से लौट आया है,जब गाँव की बेटियाँ अपने-अपने मायके आ गयी हैं और बहुएँ अपने-अपने मायके चली गयी हैं। उन सभी बेटियों को माँ मायके बुलाएगीं जिनकी 'माँ' होगी। मेरे दिल में तो माँ कुएड़ी(कोहरा) जैसी धुँध छायी हुई है जिसमें कुछ दिखाई -सुझायी नहीं देता।

 

 


हे माँ, चैत माह में पहाड़ों पर मुल्वड़ी(एक चिड़िया)भी गाती होगी।पेड़-पौधों पर नये-नये पत्ते आ गये होगें और बुराँस पर भी लाल-लाल फूल आ गये होगें।माल की घुघती भी मायके आती होगी।पेड़ पर माँ, हिलाँस (पहाड़ी प्रदेश में पाये जाने वाला एक पक्षी)भी गीत गाती होगी।

माँ,उदासी और खुदेड़ माह की ऋतु फिर लौट आयी है।पहाड़ों की चोटियाँ भी हरी-भरी हो गयी होगीं।पेड़-पौधे फूलों से लद गये होगें। पेड़ों पर घुघती गाती होगी। हे माँ सभी माँएँ अपनी-अपनी बेटियों को मायके बुलाएँगी। मेरे दिल में तो माँ ,कोहरे सी धुँध छायी हुई है जिसमें कुछ भी दिखाई-सुझायी नहीं देता।

काफूल के पेड़ भी माँ लाल-लाल पके काफूलों से भर गये होगें। गाँव के लोग उनको नमक लगा लगाकर खा रहे होगें। गाँव की दीदी-बहनें अब घास -लकड़ी काटने जंगल नहीं जा रहीं होगीं। वे कन्डलि को हटाकर-काटकर हिसर(एक प्रकार का खट्टा-मीठा फल) निकालती होगी। हे माँ, तुझे जब हिचकी आती होगी और जब- जब तेरे चूल्हे की आग भरभराती होगी तब-तब तू बोलती होगी कि बेटी(मैं )मायके आती होगी। माँ,मुझे भाइयों की याद आ रही है। मेरे दिल में तो माँ, कोहरे की धुँध सी छायी हुई है,जिसमें कुछ भी दिखाई-सुझायी नहीं देता।

गाँव की बेटी-ब्वारी(बहुएँ) खेतों से कुर्र(एक प्रकार की घास जो कि फसल के साथ ही उग आती है) निकालती होगीं।गेहूँ-जौ के खेत भी हरे-भरे हो गये होगें।माँ,ये बारह महीनों का तीज-त्यौहारों का मौसम (ऋतु) आयेगा । जिनकी माँ होगीं वे बेटियोँ को मायके बुलाएँगी।गाँव की सभी दीदी-भुली(बहनें) मायके आ गयीं होगीं। हे माँ,मेरे दिल मे तो कोहरे की धुँध सी छायी हुई है जिसमें कुछ दिखाई-सुझायी नहीं देता।

मेरे स्वामी (पति)हमेशा परदेश ही रहते हैं। जबकि उनके सभी साथी अपने घर आ गये हैं इनको तो परदेश रहना ही प्रिय (अच्छा लगता) है उनका रास्ता देखते-देखते माँ,दिन और महिनों बीत गये।जब कभी हिचकी आती या फिर चूल्हे की आग भरभराती तो मै सोचती थी कि या तो इनकी चिट्ठी आती होगी या फिर ये घर आ रहे होगें । परन्तु माँ ,जब से ये गये हैं तब से इनकी तो चिट्ठी भी नहीं आयी।मेरे दिल में तो माँ कोहरे सी धुँध छायी हुई है जिसमें कुछ दिखाई-सुझायी नहीं देता ।

मेरे पिताजी भी निर्मोही रहे जिन्होंने पाथ(एक लकड़ी का अनाज मापने का बर्तन) भरकर रुपये लिए। (पुराने समय में विवाह में दुल्हन पक्ष ,वर पक्ष से रुपये लेता था।) माँ,मेरी सास मुझ अभागन को गाली देती है ताना मारकर बासी खाना देती है और कहती है तेरे पिताजी ने रुपये नहीं लिए होते तो मेरे लाल(बेटे) को परदेश नहीं रहना पड़ता । माँ,पिताजी ने ही मेरी ये गति दुर्दशा बनायी है।मेरे हँसने खेलने के दिन(जवानी)तो माँ, इनका रास्ता देखते-देखते गुजर गये।चिट्ठी भी नहीं आयी माँ,तब से इनकी। मेरे दिल में तो कोहरे सी धुँध छायी है माँ,जिसमें कुछ दिखाई-सुझायी नहीं देता ।

 

Bhajan Singh