Sarg Daadoo Paanee De

Uttarakhand Sarg_Daadoo_Paanee_De UK Academe

किसी गाँव में एक छोटा सा परिवार रहता था जिसमें तीन सदस्य थे । एक बुजुर्ग महिला, उसकी लड़की और उसकी बहु। तीनो मिलकर खेती-बाड़ी कर अपना भरण-पोषण करते थे। खेती-बाड़ी का कार्य उसकी लड़की और बहु ही करती थी जो कि लगभग हम उम्र ही थी। महिला की बहु बहुत ही भोली और मेहनती थी। महिला भली थी परन्तु बहु फिर भी डरकर रहती थी। महिला की लड़की स्वभाव से बेफिक्र, चुलबुल और लापरवाह थी परन्तु निकम्मी नहीं थी। काम में दोनो ननद-भावज मे होड़ रहती थी फिर भी मिलजुलकर रहती थी। कोई किसी की शिकायत नहीं करता था।।

 

 

जेठ माह की भरी दोपहरी में धरती तवे सी तप रही थी। खेत-खलिहान में काम जल्दी निपटाने की कोशिश हो रही थी। उस दिन उन्हें गेहूँ की दाँय लेनी थी। खलिहान में दाँय लेते हुए बैल कुछ अनाज मुँह मे उठा लेते थे तो वह उनके मुँह पर म्वाल(एक विशेष प्रकार की रस्सी की जाली जो पशुओं के मुँह पर बाँधने के लिए बनाई जाती है)बाँधकर घुमाने लगी। मंडाई के लिए अनाज की मात्रा अधिक थी। देखते-देखते सूरज सिर पर चढ़ आया। जेठ की गरमी में बैल हाँफने लगे और वे दोनों भी पसीने से लथपथ हो गयीं। तभी बुढ़िया बाहर निकली और उसने बैल खोलने को कहा । उन्होंने बैल खोले।बैल बुरी तरह से हाँफने लगे ।बुढ़िया ने कहा जाओ इन्हें प्यास लगी है, पानी पिला लाओ। ननद -भावज कहीं किसी से बातो मे ही न लग जाए इसलिए देर न हो,यह सोचकर बुढ़िया ने उन्हें लालच दिया--

" मैने आज बहुत अच्छा खाना बनाया है। जो बैलों की जोड़ी को पहले पानी पिलाकर लाएगी, उसे ही खाने को खीर मिलेगी। " 'खीर तो मैं ही खाऊँगी' ननद उछली। लड़की ने उस कमजोर बैल की तरफ देखा एक सोटी मारकर तेज दौड़ाए। भाभी चिढ़ी उसने भी अपने बैलों को तेज हाँका।उन पर खूब सोटियाँ( एक छड़ी)बरसायी, इससे उसके बैल ननद के बैलों से दूर निकल गये। उन्हें पकड़ पाना ननद का असम्भव सा था। पानी का तालाब गाँव से दूर दूसरी पहाड़ी पर था । ननद को और अधिक क्रोध आया,कुछ अपने ऊपर ,कुछ बैलों पर और सबसे ज्यादा भाभी पर। खीर अब भाभी को ही मिलेगी लह सोचने लगी। अचानक उसने अपने बैलों को अधबट(आधे रास्ते) से ही वापिस लौटा लिए और घर लाकर प्यासे ही खूँटे से बाँध दिए।।

माँ ने बेटी को शाबाशी दी।बाद में बहु भी अपने बैलों को लेकर आ गयी।सास ने बहु को छंछेड़ा (छाँछ में पका एक प्रकार का चावल जिसका स्वाद खट्ठा होता है।) दिया।बेटी को खीर का कटोरा परोसा। बहु छंछेड़ा का निवाला मुँह में डालती पर वह ऊपर को वापिस आता निगलते ही नहीं बन पा रहा था।उसे ननद का बैलों को पानी न पिलाने का विचार मन में आता तो कभी खीर के कटोरे का परन्तु उसने ननद की शिकायत अपनी सास से नहीं की।। ननद के बैल प्यासे तड़पने लगे। भाभी ने खाना खाने के बाद ननद से कहा, 'ननदी, खीर तो तुमने खा ही ली। चलो अब,बैलों को पानी पिला दें' ।। ननद-भावज दोनों गौशाला पहुँची। वहाँ, उन्होंने देखा कि एक जो कमजोर बैल था प्यास के मारे तड़प रहा था। उस बैल की आँखों मे आँसू थे। देखते ही देखते उसकी गर्दन बेजान होकर एक तरफ लुड़क गयी और वो मर गया। मरते हुए उसने ननद को शाप दे दिया- 'जा, तू चिड़िया हो जा और जिन्दगी भर मेरी ही तरह प्यासी तड़पती रह'।।

 

 

कहतें हैं कि वह लड़की तत्क्षण चिड़िया बन गयी । तब से वो बैल की शाप की वजह से प्यासी ही रहती है। वह प्यास जैसे उसके साँसों में हमेशा के लिए समा गयी। आज भी जेठ माह की दोपहरी में 'सर्ग दादू पाणी दे' कहती हुई आकाश से पानी माँगती रहती है । धरती का पानी वह नहीं पीती उसमें उसे बैल का खून दिखाई देता है। वह चिड़िया बरसात की पत्तों पर गिरी पानी की बूँदें ही यदा कदा पीती दिखाई पड़ती है।।

Unknown, Laukik Gaathaen