Sadei

Uttarakhand Sadei UK Academe

'हे उच्चि डांडियों,तुम निसी ह्वै जावा,घणी कुलइयीं तुम छाँटी होवा।

मैं तईं लगीं छ खुद मैतुड़ा की,बाबा जी कु देश देखण देवा!

'हे ऊँचे-ऊँचे पर्वतों तुम झुक जाओ!हे घने-घने चीड़ के वृक्षों, तुम छोटे हो जाओ!मुझे अपने मायके की याद आ रही है। मुझे अपने पिताजी का देश(गाँव)देखने दो !.
सदेई के गीत के ये बोल आज भी उसी की तरह अमर हैं। चैत माह मे औजी लोग (ढोल और मूसाबाज/बीन बजाने वाले ) उसी के ये गीत हैं। यह लोक कथा उतराखण्ड के गाँव की उस समय की है जब आज के हालातों से भिन्न समय था जब यातायात का कोई साधन नहीं था, न सड़कें थी ,न कोई पुल था, न कोई संचार का साधन था।

सड़कों के नाम पर केवल पगडण्डी, कच्चे रास्ते, नदी ,गदेरे, घने जंगल, जंगली जानवर का भय, तब लोग इक्कठे झुंड मे चलते थे।अकेले जाने की हिम्मत किसी मे न थी।ब्याह- शादी में भी बारात पैदल ही आया-जाया करती थी। निर्धनता भी अधिक थी। गाँवों के लोगों का मुख्य पेशा खेती-बाड़ी ही होता था।जो केवल अपने भरण-पोषण के लिए ही होता था। घर में लड़की होना तो जैसे अभिशाप ही था। माँ- बाप भी लड़की को बोझ समझते थे इसी कारण छोटी उम्र में ही उसकी शादी कर दिया करते थे। चाहे रिश्ता दूर से ही क्यों न हो।

इसी तरह सदेई एक लड़की की लोक कथा है जिसका ब्याह एक सुदूर गाँव मे हुआ था वह अपने माँ-बाप की इकलौती संतान थी।सदेई जब नौ वर्ष की थी तभी उसका विवाह हो गया था।

 

 

सदेई कोअपने मायके की बहुत याद आती थी। उसके सामने ऊँचे बड़े-बड़े पहाड़ दीवार बनकर खड़े दिखाई देते थे तो वो और भी दुखी हो जाती थी।उन्हीं पहाड़ों के उस पार उसके पिताजी का देश उसका मायका था।पक्षियों को देखकर वो सोचती काश!उसके भी पंख होते तो वह भी फुर्र उड़कर चली जाती। अपने मन को बहलाने के लिए उसने एक पहाड़ की चोटी पर अपने हाथों से एक चौंरी(चत्वरिका) बनायी और उसमें एक शिलंग का पौधा बड़े जतन से लगाया था। उस पौधे से उसे बहुत लगाव था।वह उस पौधे को "मेरे मायके का पौधा" कहकर पुकारती थी। घास-लकड़ी अथवा किसी और बहाने से उधर से गुजरती तो उस पौधे के पास अवश्य बैठती। समय गुजरने के साथ-साथ वह पौधा बड़ा होकर पेड़ बन गया । इतने वर्षों बाद भी सदेई के माँ-बाबा ने उसकी खैर -खबर नहीं ली। सदेई उस पेड़ के नीचे जब भी बैठती और उदास हो जाती उसकी आँखों से आँसू छलक आते और कहती-काश! मेरा भी एक भाई होता !जो मुझसे मिलने आता और मायके ले जाता। इस तरह वह रोज रोते-रोते अपनी कुल देवी भवानी को उलाहना देती और फूट-फूट कर रो पड़ती।

सदेई की ससुराल उसके मायके से बहुत दूर थी। कच्चे, टेड़े-मेढ़े रास्ते,नदी-गदेरे और ऊपर से घने-घने जंगल अपने मायके आती भी तो कैसे?उसकी सास उसे मायके भेजती न थी,और उसकी माँ उसे बुलाती न थी। बेचारी सदेई, हाण्डी में पकते चावल की तरह मायके की याद में छटपटाती रहती थी। वह जब भी गाँव की बहु- बेटियों को अपने-अपने मायके आते-जाते देखती

तो उसके दिल में एक हूक सी उठती और कहती,काश!मेरा भी कोई भाई होता!वह मुझे भी बुलानेआताऔर मैं भी उसके साथ मै भी अपने मायके जाती! और सदेई गीत गाते-गाते रो पड़ती।
वह हर रोज कुल देवी भवानी के मंदिर जाती और भाई के लिए देवी से प्रार्थना करती।उसकी इस दशा पर कुल देवी भवानी को दया आयी तब एक दिन जब सदेई मायके की याद मे रोते-रोते सो गयी तो देवी उसके सपने में आयी और बोली,सदेई, दुखी मत हो! 'मै वर देती हूँ कि तेरा एक भाई होगा।'सदेई नेप्रत्युत्तर में शीश झुकाया और बोली, जिस दिन मेरा भाई मुझसे मिलने आएगा। 'माँ, मैं अष्टबलि चढ़ाऊँगी।'वर देकर देवी भवानी अंतर्धान हो गयी। सदेई इसे एक सपना मात्र समझती थी।उसे आभास ही नहीं था कि सहसा एक दिन उसका सपना सत्य होगा लेकिन देवी भवानी की दैणी( कृपा ) हुई। उसके मायके में सदेई का एक भाई का जन्म हुआ।माँ ने उसका नाम सदेई के नाम पर सदेऊ रखा।

सदेऊ एक होनहार बालक था।समय बीतता गया और सदेऊ अब बड़ा हो गया था। वह गाँव में दूसरे भाई- बहनों को देखता तो सोचता-' काश! मेरी भी कोई बहन होती'। एक दिन घर में बात छिड़ी तो माँ ने सदेऊ को बताया उसकी एक बहन है सदेई और वह दूर गाँव में उसकी ससुराल है। सदेऊ अपनी बहन से मिलने के लिए लालायित हो उठा।वह उससे मिलने जाने के लिए माँ से जिद करने लगा। माँ उसेअधिक दूरी व जंगली-जानवरों का,नदी गदेरों के डर से उसे मना कर देती।
एक दिन स्वप्न में उसने दूर पहाड़ की चोटी पर शिलंग पेड़ के नीचे एक लड़की को'भैय्या-भैय्या'पुकारते देखा। उसने भी उसे 'बहन-बहन'कहकर पुकारा ही था तभी उसकी नींद टूट गयी। उसका मन कह रहा था कि यही उसकी बहिन थी। वह दौड़कर माँ के पास गया और सारी बात माँ को बतायी।सारी बातें सुनकर माँ की आँखे छलछला उठी। उसने कहा, 'तू वहाँ कहाँ जाएगा बेटा?रास्ते में भयंकर घने जंगल हैं, जंगली-जानवरों का डर है,नदी और बड़े-बड़े गदेरें हैं, तू उन्हें कैसे पार करेगा। "नहीं-नहीं, बेटा तू वहाँ नहीं जायेगा।

सदेऊ,बोला, 'माँ, मुझे मेरी आँखे ही रास्ता दिखाएगीं। अपने ही हाथ-पैरों से मैं नदी-गदेरे पार करुँगा। इन हाथों से ही रास्ते में मिलने वाले जंगली-जानवरों को मार भगाऊँगा। मेरे कुल देवता मेरी रास्ते की हर मुश्किल दूर कर मेरी रक्षा करेंगे ।
उसने माँ की एक नहीं सुनी और अपनी बहन सदेई से मिलने उसके ससुराल की ओर चल दिया ।कई
दिन पैदल नदी ,गदेरों घने जंगलों को पार करतेऔर पूछते-पूछते आखिर में सदेऊ देव कृपा से उस पहाड़ी पर पहुँचा। जहाँ वह शिलंग का पेड़ था जिसके नीचे आते -जाते सदेई बैठा करती थी।
गाँव वालों ने देखा और पूछा कि वह कौन है ?और कहाँ से आया है ?तब उसने अपना परिचय दिया। गाँव वालों ने ही सदेई को बताया कि एक लड़का सफेद कपड़ो में उस शिलंग के पेड़ के नीचे बैठा है जिसकी अनुहार(शक्ल) बिल्कुल तुम्हारी जैसी ही है, 'तेरा भाई तो नहीं है?'

 

 

'मेरा भाई'!सदेई को सहसा लगा कि उसकी अनुहार का उसी का भाई तो नहीं है फिर उसने सोचा कि उसका तो कोई भाई है नहीं फिर भी उसको लग रहा था कि इतने वर्षों बाद उसका भाई ही तो नहीं आया है। वह वैसे ही उस पहाड़ की चोटी की तरफ दौड़ पड़ी। बहन की भाई पर और भाई की बहन पर नजर पड़ी। सदेई नेअपने ही अनुहार के भाई को देखा। तभी भाई ने कहा,'बहन,सदेई'! सदेई और सदेऊ दोनों भाई-बहनों की आँखों से अश्रुधारा निकल पड़ी। दोनो एक-दूसरे के गले लगे। भाई सदेऊ ने कहा,'बहन एक दिन मैने तुम्हें इसी पेड़ के नीचे भैय्या-भैय्या पुकारते देखा और मुझसे रहा नहीगया गया।उसी दिन तुम्हें मिलने की ठान ली थी और मैं तुमसे मिलने चला आया।'
सदेई की आँखें स्नेह से छलछला उठीं। बोली,' देवी भवानी दैणी हुई,हे भुला!मेरी मनोकामना पूरी हुई। कल मैं अनुष्ठान कराऊँगी,बलि चढ़ाऊँगी'।अब सदेई दो बच्चों की माँ थी।अपने दोनो बच्चों को बुलाकर उसने,'देखो बेटा'ये तुम्हारे मामा हैं बड़ी मुश्किल से हमसे मिलने आये हैं'। देखते ही देखते दोनों बच्चे भी अपने मामा से अच्छी तरह घुल-मिल गये।

दूसरे बहन सदेई ने एक सुन्दर मण्डप तैयार करवाया। आवश्यक सामग्री मँगवाई और अनुष्ठान प्रारम्भ करवाया। सारा वातावरण मंत्र ध्वनि से गूँज उठा। बलि का समय होने पर पुरोहितों ने बलि के लिए बकरे मंगवाये। तभी सहसा आकाशवाणी हुई', पशु बलि नहीं, नर बलि चाहिए।' सभी हैरान हो गये-नरबलि! न जाने देवी की क्या इच्छा है। वहाँ उपस्थित सभी लोग भौचक्के रह गये। लेकिन सदेई भी दृढ़ प्रतिज्ञ थी। उसने कहा-'मैं तैयार हूँ।' पुनः आकाशवाणी हुई,नहीं! 'स्त्री बलि वर्जित है।' अपने भाई की बलि दो!' 'अपने भाई की बलि!'सदेई का सारा शरीर काँप गया।'नहीं ऐसा नहीं हो सकता,मैं गोत्र हत्या नहीं करुँगी। कोख में पुत्र मिल जाता है,परन्तु पीठ का भाई नहीं मिलता! फिर भाई मेरा अतिथि है,'मै अतिथि हत्या नहीं करुँगी!'
तभी फिर आकाश वाणी हुई , 'तै फिर अपने दोनों पुत्रों की बलि दो!'अपने पुत्रों की बलि!'पुत्रो की हत्या करुँगी तो मेरी कोख सूनी हो जायेगी!'इतना कहकर वह यज्ञ वेदी के पास बेहोश हो गयी।
'तो रहने दो,तुमने जो प्रतिज्ञा की थी कह दो कि वह झूठ थी।'..... आकाशवाणी हुई। 'नहीं!' सदेई का सत्व जागा और बोली,'ठीक है मैं पुत्रों की बलि दूँगी'।

वहाँ उपस्थित लोगों ने सुना तो सब दंग रह गये। सबके चेहरों पर उदासी छा गयी।लोग आपस में कानाफूसी करने लगे। लेकिन सदेई तो जैसे स्वयं चण्डिका बनी हुई थी। उसने अपने दोनों पुत्रों को बुलाया और उनके कपड़े उतारने लगी। तभी एक लड़के ने पूछा,'माँ, हमारे कपड़े क्यों उतार रही हो?'तुम्हारे मामा तुम्हारे लिए नये-नये कफड़े लाए हैं।'तुम्हें नये कपड़े पहनाऊँगी, बेटे। कहते-कहते उसने खड्ग प्रहार कर दिया दोनों के सिर भूमि पर गिर गये। सब 'हाय-हाय 'करते रह गये। सदेई ने दोनों के सिरों को एक कफड़े में लपेटा और अंदर यह सोचकर कि एक बार इनका मुँह जी -भर कर देख लूँगी और दोनों धड़ो को लेकर यज्ञ मण्डप में आ गयी।

लेकिन जैसे निष्ठुर देवी भवानी को इतने से भी चैन न था। तभी फिर से आकाशवाणी हुई,नहीं सदेई, बिना सिरो के धड़ अनुष्ठान मे नहीं चढ़ाए जाते। सिरों को भी लाओ।' सदेई ने आकाशवाणी सुनी जिसे सुनकर वह सिरों के लेने घर अन्दर गयी तो दोनों लड़कों को मामा के साथ हँसते -खेलते देखकर उसका खुशी का ठिकाना न रहा । वह आश्चर्यचकित रह गयी।

'सब माँ भवानी की कृपा है' सदेई मन ही मन मे बुदबुदायी और देवी भवानी की प्रतिमा के सामने नतमस्तक हो गयी। सदेई त्याग और बलिदान की,आस्था और भक्ति की परीक्षा में एकदम खरी उतरी थी। उसे उसकी सच्ची आस्था और भक्ति का फल मिला। भाई-बहन की यह प्रेम कथा आज भी औजी लोग हर जगह चैत माह में गाते और सुनाते हैं। इसी प्रकार के मनुष्य इस लोक को छोड़ जाते हैं परन्तु अपनी अमर यशोगाथा अपने पीछे छोड़ जाते हैं।

Unknown, Laukik Gaathaen