Jasee Part 1

Uttarakhand Jasee_Part_1 UK Academe

रूप आगलि होली वा धर्मावती राणी,
रूप आगलि होली सेली सीतली।
भुका देखीक बा खाणू नी खांदी,
नांगा देखीक बस्तर नी लांदी।
जनी छई राणी बल तनी छयो राजा,
दान्यों मा दानी होलो बल हरिचन्द राजा,
रिंगदी डिंड्याली छै जैकी उड़दी अटाली,
धारु गरुड़े छै जैकी गाडू घटूडे।
ढुंगा जसो धन छयो मेघ जसो मन,
गाडू का ढुंगा पूजीन राजान, धारु का मशाण,
पर राजा का घर बेटा नी जरमे।
तब सुमरदो राजा पंचनाम देव,
जरमी गए नौनी एक वैकी देवतौं का वर न।
बुलौन्द राजा गया का बरमा, काशी का पंडित-
तुम मेरा बरमो, देखा मेरी कन्या को राश भाग?
भली होये नौनी तेरी राजा जसीली, जसी नौ की।
जौन सी टुकड़ी नौनी, फ्यूँली-सी कोंपली।
सेरा का बीच जना साट्यों की बोटली,
तनी कबलांदी डाली-सी वा ह्वै सुघर तरुणी।
वीरुवा भण्डारी होलो भडू मा को भड़,
नौं को ही बीर छयो बड़ा बाबू को बेटा।
लम्बी भुजा छई वैकी चौड़ी छई छाती,
वीरुवा भण्डारी वांको होलो ज्वान।
व्यौं की बात होये ढोल बज्या खुशी का,
नारैण आये लगसमी व्याण,
मादेवन जनी पारवती पाये।
वीरुवा जसी की बांधेणे मलेऊ जसी जोड़ी।

अगासन जोन पाये फूल तै मिले भौंर।
धरती तै स्वाग मिले, मनखी तैं भाग।
तब जसी बीरुवा को ह्वैगे माछी पाणी ज्यू,
एका बिना हैका नी खांदो,
एक बिना हैको नी रन्दो।
द्वि होला वो पर एकी होलो शरील।
धातुओं मा सोनू जनो होन्द जसी-
तनी नारियों मा वा होली नार।
मायान लुपटाणे जिकुड़ी वीं की,
शर्त मा जनी होन्दी माखी!
घर बार भूले बीरुवा भूले संगसार।
तब एक दिन वै सुपिनो ह्वै गये-
सुपिना मा अपणो बुबा देखे वैन-
चचड़ैक बैठे वीरु, भिबड़ेक बैठे।
मैं जान्दू गया जसी राणी,
मैंकू बणाऊं कलेऊ, गाड वस्तर मेरा।
तेरी माया मेरा दगड़ी ईश्वर की-सी छाँया।
मैना दुय्येक मा घर औलो,
आँगड़ी टालखी त्वैक लौंलो
रोन्दी दणमण तब जसी नारी,
तुम होला स्वामी मेरा सिर का छतर,
गला की माला होला, स्वाग की बेन्दी!
छुड़ाये भण्डारीन वीं की अंग्वाल,
तब भण्डारी गया गैगे।
रातू की सेन्दी नी जसी तब, दिनू कू खांदी नी।

लांदी नी वा पैरेन्दी नी च,
वीं क तैं बस सोच एक ही होई च।
मैंलो ह्वैगे घुमैलो रूप वीं को,
फूल नी अलसै वा, घूल जसी ह्वैगे।
सासू छै वीं की पùावती,
व्वारी देखी वीं की आँखी होंदी छई लाल,
ईन करे मेरा नौना पर जाप,
बै का नौ अब बै नी बोदो,
पूत पालीक होई ब्वारी भौंदो।
दांत किटकारी सासू काल-सी भिटगदी।
भ्वाँ तड़गे तमानो नी च ईं को,
अभागी राँड की जाई या,
पाणी तक को स्वारी नी भरोसो जैंको।
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हलकदी ढलकदी तब एक दिन जसी,
पाणी पंद्यारा पैटे।
लोसेन्दी घाघुरी पैरी वींन, सूवा-पंखी धरे।
हिंवालू मा नन्दा जसी गागर लीक पाणीक गैगे।
पैटीन दीदी भुली चौदिशा बिटा
बीच मा चलदी जसी गैणी जनो।
दगड़ा दगड़याणी घर ऐन वर,
जसी पंद्यारा नहेन्दी च धोयेन्दी खूब कैकी।
तब हेरदे वा छैलुड़ी वा पाणी मांग,
दुई छैल देखीक वा चौदिशा नजर लांदी।

Unknown, Laukik Gaathaen