Introduction

Uttarakhand Introduction UK Academe

किसी भी समाज की सांस्कृतिक धरोहर को उसकी मौखिक परम्पराओं एवं लोक साहित्य में ही देखा जा सकता है। किसी समाज को जानने व समझने के लिए उसके लोक साहित्य को जानना और समझना होगा। लोक साहितँय की यह विशेषता है कि वह मौखिक अथवा वाचिक स्वरूप में जनमानस के जीवन में घुला-मिला रहता है।। सामाजिक जीवन की जीवन्तता व जीवटता की छाप उस समाज के लोगों की जुबान से निकले गीतों एवं कथाओं मे दिखाई देती है। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि लोक जीवन की सहज अनुभूति और अभिव्यक्ति ही लोक साहित्य है।। जहाँ भी लोगों का समूह होगा वहाँ किस्से-कहानियां, चुटकले, लोरियाँ, गीतों का जीवन्त संसार भी अवश्य होगा। ये सभी लोक साहित्य के रुप मे मानवीय जीवन का एक अनिवार्य भाग है। लोक साहित्य की इस विधा को जीवित रखने वाले दादा-दादी व नाना-नानी हैं जो इनको अपनी भावी पीढ़ी दर पीढ़ी को सुनाते हैं।।लोक कथाओं को कहने- सुनने का उद्देश्य मित्रों-परिजनों के साथ उपस्थित समय को कैसे और ज्यादा आनन्द-प्रमोद में बितायें यही सर्वोपरि रहा है।

 

 

समाज में प्रचलित लोक कथाएंँ उस समाज के मूल स्वभाव और उस समाज के संस्कारों को दर्शाती हैं लोक कथाएंँ आम आदमी के सपनों का आइना होती हैं इन्हें पढ़ने और सुनने का मतलब अपनी जड़ो से जुड़ना अपनी आमूल्य धरोहर को सहेजना है। उत्तराखण्डी लोक गाथाएंँ वीरों और देवी-देवताओं को समर्पित हैं उत्तराखण्ड के क्षेत्र नैसर्गिक सुन्दरता के कारण ही यहाँ का लोक साहित्य मौखिक एवम् प्रकृति प्रधान है शहरी समाज की दुनियादारी को दरकिनार करते हुए यहाँ की लोक कथाओं और गीतों में प्रकृति के विभिन्न रुपों जंगल,पहाड़, झरने, पशु-पक्षियों, फूलों और फलों की अधिकता है भौगोलिक विविधताओं और विशिष्टताओं से भरपूर रंग-बिरंगी सांस्कृतिक स्वरूप इन लोक कथाओं मे मिलता है।गढ़वाली, कुमाऊं,जौनसारी, भोटिया, थारु -बोक्सा आदि समाजों की लोक कथाओं में इन प्रभावों का सपष्ट रुप से उल्लेख मिलता है।। 'गौथ,तोर दाल चुला मा धैरीक, कुटेरि खुल्दी छुयों की, दगड़ा बैठीख, लम्बी राति ह्यूंद की,कट्दि छुयूं मा, तू भी ऐ जा कछिड़़ी मा, ह्यूंद मैनों मा,मैरो गौं मा।। लोक कथाओं का आकर्षण लोगों को ठंडी रात में भी जागे रहने को विवश कर देती हैं ।

लोक कथा का वक्ता हुंगारा लगाते हुए सुनने वालों को सपनों की दुनिया की सैर कराते हुए उन्हें उन्हीं के चौक-खलिहान मे काथ-काणी,रात-ब्याणी(कथा पूर्ण हुई और रात भी गयी) कहते हुए वापिस वहीं ले भी आता है। इन उत्तराखण्डी लोक कथाओं में ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकाराते हुए लोगों को धर्म के अनुसार आचार-व्यवहार के लिये प्रेरित करते हैं। उत्तराखण्डी समाज में देवी -देवताओं की मान्यता कुछ अलग प्राकृतिक एवम् पौराणिक देवी-देवताओं के स्थान पर इनके स्थानीय रुपों की ही आस्था और प्रतिष्ठा है। यद्यपि प्रदेश के अन्य भागों मेंअथवा समाजों मे प्रचलित लोक कथाओं मे मूल मे थोड़ा -बहुत अन्तर रहता है

Hukam Singh Negi, Laukik Gaathaen