Teelu Rauteli

Teelu_Rauteli
  • 14 Apr
  • 2020

Teelu Rauteli

तीलू रौतेली, उत्तराखंड राज्य के गढ़वाल की एक ऐसी वीरांगना कही जाती है, जो केवल 15 वर्ष की उम्र में रणभूमि में कूद पड़ी, और सात साल तक अपने दुश्मन राजाओं को कड़ी टक्कर दी थी। 15 से 20 वर्ष की आयु में इस प्रकार युद्ध लड़ने वाली तीलू रौतेली संभवत विश्व की एक मात्र वीरांगना है। तीलू रौतेली को तिलोत्‍तमा देवी भी कहा जाता था। उन्हें उत्तराखण्ड की रानी लक्ष्मीबाई के नाम से प्रसिद्ध है।

 

तीलू रौतेली के पिता का नाम भूपसिंह था, जो गढ़वाल नरेश की सेना में थे। इनका जन्म 8 अगस्त 1661 को हुआ था। इसी कारण गढ़वाल में 8 अगस्त को उनकी जयंती भी मनायी जाती है।

 

 

 

15 वर्ष की आयु में ही, तीलू रौतेली की सगाई इडा गाँव (पट्टी मोंदाडस्यु) के भुप्पा सिंह नेगी के पुत्र के साथ हुई थी। उस समय गढ़वाल में कन्त्यूरों के लगातार हमले हो रहे थे और इन हमलों में कन्त्यूरों के खिलाफ लड़ते-लड़ते तीलू के पिता ने युद्ध भूमि पर अपने प्राण न्यौछावर कर दिये। इनके प्रतिशोध में तीलू के मंगेतर और दोनों भाइयों भग्तू और पथ्वा ने भी युद्धभूमि में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए। तीलू रौतेली ने अपने प्रारंभिक जीवन का अधिकांश समय बीरोंखाल के कांडा मल्ला, गांव में व्यतीत किया।

 

बहुत समय पहले, कत्यूर राजा, धाम शाही ने गढ़वाल राज्य पर हमला किया था। जिसमें गढ़वाल के राजा, मान शाही को बेरहमी से हराया गया और गढ़वाल के एक प्रसिद्ध क्षेत्र खैरागढ़, धाम शाही की गिरफ्त में आ गया। धाम शाही एक बहुत ही क्रूर राजा था जिसने अनुचित करों को लगाया और लोगों पर हिंसक अत्याचार किया। गढ़वालियों, विशेषकर क्षेत्र के नेता इस व्यवस्था से बेहद नाखुश थे। जल्दी से, कत्यूर साम्राज्य के खिलाफ विद्रोह ने गति पकड़ना शुरू कर दिया। क्रांतिकारी समूह के नेताओं में से एक भूपू गोराला युद्ध में मारे गए थे। उनके दो बेटे थे, जिन्होंने अपने पिता की मृत्यु के बाद विद्रोह के हिस्से के रूप में हथियार उठाए लेकिन उन्होंने भी लड़ते हुए अपनी जान गंवा दी।

भूपू गोराला की बेटी तीलू थी, जो पंद्रह साल की थी जब उसके पिता और दो भाई युद्ध में हार गए थे। जिस स्थान पर तीलू के भाई मारे गए थे, कांडा, एक त्यौहार का मैदान था जहाँ पारंपरिक मेला, थौल, प्रतिवर्ष आयोजित किया जाता था। उसी जगह उसके भाइयों की मृत्यु हो गई थी जहां थौल आयोजित किया गया था। तीलू की माँ ने उससे कहा कि अगर वह खेलना चाहती है, तो उसे युद्ध के मैदान में वहाँ के योद्धाओं की तरह खेलना चाहिए। तीलू की माँ ने उसे इस प्रकार से ये शब्द कहे की-

तीलू तू कैसी है, रे! तुझे अपने भाइयों की याद नहीं आती। तेरे पिता का प्रतिशोध कौन लेगा रे! जा रणभूमि में जा और अपने भाइयों की मौत का बदला ले। ले सकती है क्या? फिर खेलना थौल!

तीलू के बाल मन को ठेस लगी और उसने ये बात दिल से लगा ली। मेले में जाने की इच्छा को नकारते हुए, उसने अपने पिता और भाइयों की मृत्यु का बदला लेने का फैसला किया। उसने खुद को शपथ दिलाई कि वह दुश्मनों से राज्य को मुक्त कर देगी। उसने अपने मित्रों, गाँव के युवा लड़कों और लड़ने के लिए एक सेना का निर्माण शुरू किया।

प्रतिशोध की ज्वाला ने तीलू को घायल सिंहनी बना दिया था। शस्त्रों से लैस सैनिकों तथा "बिंदुली" नाम की घोड़ी और अपनी दो प्रमुख सहेलियों बेल्लु और देवली को साथ लेकर युद्धभूमि के लिए प्रस्थान किया। एक दिन इस सेना ने खैरागढ़  पर हमला किया और इसे सफलतापूर्वक जीत लिया। उसकी सेना ने दुश्मन को मारना शुरू कर दिया और एक-एक करके अन्य प्रदेशों को मुक्त कर दिया और अंततः यह सरायखेत पहुँच गया जहाँ तीलू के पिता युद्ध में मारे गए थे। सरायखेत में, एक भयानक युद्ध हुआ लेकिन अंत में तीलू विजयी हुई। जिससे वह अपने पिता की मौत का बदला लेने से खुश थी।

जब तीलू अन्य प्रदेशों को जीत रही थी, तब कत्यूर खैरागढ़ पर आक्रमण करने के लिए वापस आया। जैसे ही तीलू ने यह खबर सुनी, वह अपनी सेना के साथ खैरागढ़ लौट आई और उसे एक बार फिर जीत लिया।

 

 

 

उसके बाद उन्होनें उमटागढ़ पर धावा बोला, फिर वह अपने सैन्य दल के साथ "सल्ड महादेव" पंहुची और उसे भी शत्रु सेना के चंगुल से मुक्त कराया। चौखुटिया तक गढ़ राज्य की सीमा निर्धारित कर देने के बाद तीलू अपने सैन्य दल के साथ देघाट वापस आयी। कालिंका खाल में तीलू का शत्रु से घमासान संग्राम हुआ, सराईखेत में कन्त्यूरों को परास्त करके तीलू ने अपने पिता के बलिदान का बदला लिया; इसी जगह पर तीलू की घोड़ी "बिंदुली" भी शत्रु दल के वारों से घायल होकर तीलू का साथ छोड़ गई।

उस युद्ध के बाद, तीलू एक और गढ़वाली क्षेत्र कांडागढ़ में गया, जहां कुछ अच्छी तरह से आराम करने के लिए था। वहाँ रास्ते में, उसने नायर नदी में स्नान करने का फैसला किया। जब वह स्नान कर रही थी, एक कत्यूर सैनिक ने उसे असुरक्षित और निहत्थे देखा। जब तीलू नदी के तट पर पहुंची, तो सिपाही ने उसकी मज़बूरी का फायदा उठाया और उसे मार डाला। यह बहादुर वीरांगना मात्र 22 साल की आयु में शहीद हो गई।

 

  • इसी बात को ध्‍यान में रखते हुए उत्‍तराखंड सरकार ने तीलू देवी के नाम पर एक योजना शुरू की है, जिसका नाम तीलू रौतेली पेंशन योजना है। यह योजना उन महिलाओं को समर्पित है, जो कृषि कार्य करते हुए विकलांग हो चुकी हैं।
  • उनकी याद में आज भी कांडा ग्राम व बीरोंखाल क्षेत्र के निवासी हर वर्ष कौथीग (मेला) आयोजित करते हैं और ढ़ोल-दमाऊ तथा निशाण के साथ तीलू रौतेली की प्रतिमा का पूजन किया जाता है।
  • आज भी हर वर्ष उनके नाम का कौथिग ओर बॉलीबाल मैच का आयोजन कांडा मल्ला में किया जाता है। इस प्रतियोगीता में सभ क्षेत्रवासी भाग लेते है।
  • तीलू रौतेली की स्मृति में गढ़वाल मंडल के कई गाँव में थड्या गीत गाये जाते हैं।