Matru

Matru
  • 25 Aug
  • 2019

Matru

नाम की महिमा भी निराली है। नाम है तो सब कुछ है और नाम नहीं तो कुछ भी नहीं है। नाम ही तो व्यक्ति की पहचान है। सोचो यदि हमारे नाम न होते तो हम एक दूसरे को कैसे पहचानते? इसीलिए हर कोई नाम के पीछे भागता फिरता है।  हर व्यक्ति अपनी अभिरुचि और संस्कार के अनुसार कोई कर्म करके नाम ऊँचा करता है तो कोई धर्म करके अपना नाम रोशन करता है। आखिर नाम तो नाम ही है। किसी व्यक्ति का नाम होना उतना ही आवश्यक है जितना उसके तन पर कपड़े का होना आवश्यक है। अमीर हो चाहे गरीब, राजा हो या रंक, चाहे किसी धर्म या जाति का हो सभी के नाम होते हैं। जन्म के साथ ही नामकरण कर दिया जाता है अर्थात बिना नाम के न कोई है और न होगा।

मनुष्य जब पैदा होता है तो उसका एक सुन्दर सा नाम जो बोलने और सुनने मे अच्छा लगे, रख दिया जाता है। हर माँ-बाप की इच्छा होती है कि उनके बच्चे का एक सुन्दर सा नाम हो जिसमें उसके नामानुसार गुण भी उत्पन्न हों।

 

 

उस गाँव के लड़कों के भी अच्छे -अच्छे नाम थे परन्तु 'मटरु' के माता-पिता नाम के महत्व से अनजान बच्चे का सुन्दर सा नाम रखने की परवाह नहीं थी। उन्होंने तो उसका एक नाम भर रख दिया -मटरु। एक अटपटा सा नाम जिसका ना कोई अर्थ था और न ही बोलने-सुनने में अच्छा लगता था। घर वाले हों या गाँव वाले सभी उसे 'मटरु 'के नाम से ही बुलाते थे। उसके माता-पिता ने जो नाम रख दिया वह जीवन पर्यन्त अटल। परन्तु उसके दोस्तों को मटरु नाम रास नहीं आता था। वे अक्सर उससे कहते थे,तेरे माँ-बाप ने तेरा क्या अजीब सा नाम रख दिया मटरु। उन्हें कोई और नाम नहीं मिला? परन्तु मटरु हँस भर देता उसे इस नाम से कोई परेशानी नहीं थी। कहता था नाम - वाम मे क्या रखा है, माँ-बाप ने प्यार से जो रख दिया सो ठीक है। मुझे कौन सा स्कूल पढ़ना है, जो मेरा अच्छा सा नाम रखा जाता? नाम से पुकारना ही तो है, नाम से क्या फर्क पड़ता है? जिनके नाम सुन्दर से हैं उनमें क्या खूबी है जैसे वे वैसा ही मैं।

कुछ समय पश्चात जब मटरु की शादी हुई तो उसका यह तर्क अपनी पत्नी के सामने  न चल सका। उसकी पत्नी बार-बार उससे अपने नाम बदलने को कहती थी कि - "छीःभई, तुम्हर भी क्या नऊँ धरि मटरु। "नऊँ, न नऊँ को ढंग"(छी भई, तुम्हारा भी क्या नाम रखा है मटरु। नाम न ,नाम का ढंग)। परन्तु मटरु पर उसकी इस बात का कोई असर नहीं पड़ा। वह बोला जैसा भी है मेरा है,तुम्हारा नहीं, तुम्हें क्यों दिक्कत है?परन्तु उसकी पत्नी अपनी जिद पर अड़ी रही कि तुम अपना नाम बदलो। वो बोली "मी तई अपणी गैल्याणियों दगड़ी नाम गड़द शरम आँदी"( मुझे अपनी सहेलियों के सामने तुम्हारा नाम बताते हुए शर्म आती है)। मटरु फिर भी अपनी बात पर अडिग था परन्तु पत्नी भी कहाँ हार मानने वाली थी।  उसकी पत्नी बोली - "जु तुमुन अपणू नऊँ नी बदली त मी तुम दगड़ी तो कतै नी बोन्या" (जो तुमने अपना नाम नहीं बदला तो मैं तुमसे कभी नहीं बोलूँगी)। पत्नी ने मटरु को अल्टीमेटम दे दिया था। अब मटरु बेचारा करता क्या न करता? आखिर उसे अपनी पत्नी के आगे झुकना ही पड़ा।

अगले दिन मटरु अपने लिए एक सुन्दर और अच्छा नाम ढूंढने निकल पड़ा। उसे चलते-चलते रास्ते में कुछ लोग एक अर्थी ले जाते हुए दिखाई पड़े। उसने उनमें से एक व्यक्ति से पूछा, "भाई,किसका देहान्त हुआ?" उसने बताया, अमर सिंह का देहांत हो गया। "अमर सिंह"! मटरु को आश्चर्य हुआ।  "नाम तो अमर सिंह है और चल बसे हैं, ये कैसी अमरता" - वह मन ही मन बुदबुदया। फिर वह आगे बढ़ चला। आगे चलकर उसे एक व्यक्ति घास खोदता हुआ दिखाई पड़ा, मटरु ने सोचा चलो इससे पूछ लेता हूँ। "भाई तुम्हारा क्या नाम है? उसने पूछा। घास खोदने वाले ने जबाब दिया,"धनपति"हूँ! नाम तो है धनपति और घास खोद रहा है? मटरु मन ही मन हँसा। वह सोचने लगा यह कैसी विचित्रता नाम कुछ और काम कुछ और। आगे चलकर उसे एक गाँव के पास एक पँधेरी (पनिहारिन) सिर पर पानी का बंटा (बर्तन) लिए जाते हुए दिखाई पड़ी। उसने सोचा इसका ही नाम पूछ लिया जाए शायद कोई अच्छा नाम मिल जाए। मटरु ने उससे कहा "भुली, त्यार नऊँ क्या च ? पँधेरी बोली, "भैजी, नऊँ त बड़ लोगूक हूँद। मेरु लगक क्या नऊँ हूण। तनु मैकू लक्ष्मी बुल्दन" (भाई जी! नाम तो बड़े ल़ोगों का होता है।भला मेरा क्या नाम होना है,वैसे मुझे लक्ष्मी बोलते हैं)। "लक्ष्मी" नाम सुनकर मटरु को बड़ी हैरानी हुई। फिर उसने पँधेरी से कहा, "बहुत सुन्दर नाम च भुली त्यार इससे सुन्दर नाम क्या ह्वै सकदू( बहुत सुन्दर नाम है बहिन इससे सुन्दर नाम क्या हो सकता है)!

 

 

मटरु ने मन में सोचा अब आगे जाना  व्यर्थ ही है। आगे जाकर भी ऐसे ही नाम वाले मिलेगें। कोई होगा डेढ़ पसली का ,जिसकी हड्डियाँ कीर्तन कर रही होगीं और नाम होगा महावीर सिंह या फिर बल बहादुर सिंह आदि। बहुत नाम सुन लिए उसने मन ही मन में कहा और वह वहीं से वापस लौट गया। वह पहले से ही बहुत थका हुआ था। आते ही चारपाई पर लेट गया और उसे लेटते ही नींद आ गई। उसकी नींद तब टूटी जब उसकी पत्नी ने उसे झकझोरा और खाना खाने के लिए कहा। खाना खाकर मटरु अपने कमरे में सोने चला गया उसकी पत्नी भी अपना रसोई का काम निपटा कर वह भी कमरे मे सोने के लिए आयी। पति का नया नाम सुनने की उसे बड़ी उत्सुकता थी वह जानना चाहती थी वे अपना नया नाम क्या रखेगें? कमरे मे जाकर वह मटरु के पैर दबाने लगी। पैर दबाते हुए वह बोली, "सुनणै छौ, कनू नौं लाया तुम छाणीक, मितइ भी बतावा" (सुनो,तुम कौन सा नाम छाँटकर लाये हो जरा मुझे भी तो बताओ)। परन्तु मटरु क्या कहता, उसे तो कोई सा भी नाम नहीं जँचा। उसे कोई भी तो ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जिसमें उसके नाम के अनुरुप गुण हों। अमर सिंह मर गया। धनपति घास खोद रहा था। भला ये भी कोई नाम हैं। मटरु मन में सोचता रहा।" अरे! ये नाम -वाम का चक्कर बेकार है। मैंने जितने भी नाम सुने सब बेकार बकवास। ऐसे नाम रखने से क्या फायदा? इसलिए  मेरा नाम जैसा भी है ठीक ही है। मटरु ने अपनी पत्नी से कहा।

अपने पति की इस प्रकार की बातें सुनकर उसकी पत्नी रुआंसी हो गई। उसे उम्मीद थी कि उसका पति कोई अच्छा सा नाम ढूंढ कर लायेगा और अपना नाम रखेगा तब वह अपनी सहेलियों को बतायेगी। उसने अपनी सहेलियों से पहले ही कह रखा था कि वह अपने पति का नाम बदलवा कर ही रहेगी। उसकी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया। वह गुमसुम हो गयी। उसके मुँह से कुछ भी बोल न निकल सके। उसे इस प्रकार चुप होते देख मटरु ने उसे समझाया और कहा-  "अरि सुन – 'अमर सिंह' को आज मैंने मरते देखा,  और 'धनपति' घास खोद रहा था। 'लक्ष्मी' को मैंने पानी भरते देखा, इसलिए जो भी हो मेरा नाम 'मटरु' ही खूब। "जा अब सो जा" उसने अपनी पत्नी  से कहा और चादर ओढ़कर सो गया। बेचारी पत्नी चादर में लिपटे उस लिजलिजे और अबूझ आदमी को देखती रह गयी।