Inter college kimsar

Inter_college_kimsar
  • 5 Aug
  • 2019

Inter college kimsar

मैं डांडामण्डल का जाना माना इंटर कॉलेज हूँ, मेरी स्थापना 1964 में क्षेत्रीय लोगो के शिक्षा के प्रति जागरूक लोगो के द्वारा की गयी। मेरा सफर एक झोपड़ी से शुरू हुआ आज मैं एक भवन के रूप में खड़ा तो हूँ लेकिन आज भी मेरी जर्जर स्थिती हो रखी है। उस जमाने मे जब तालघाटी में ही एक मात्र सड़क थी और तब कोई अन्य संसाधन उपलब्ध नही थे तब समस्त डांडामण्डल के गणमान्य व्यक्तियों ने मुझे स्कूल का रूप दिया। उस जमाने मे मुझे मिडिल स्कूल के नाम से जाना जाता था, और उस वक्त श्री सुरेंद्र दत्त मारवाड़ी जी जो दिउली स्कूल से यँहा पर आए पहले प्रधानाचार्य बने। उनके साथ श्री ब्रह्मानन्द शुक्ला जी, श्री जगत सिंह नेगी जी, श्री गिरधारीलाल अमोली जी ने यँहा पर अपनी सेवाएं देनी प्रारंभ की। मैं धीरे धीरे बाल्यावस्था से युवावस्था की ओर बढ़ने लगा और 1978 में जाकर मुझे 10वी की मान्यता मिली। जब मुझे 10 वी की मान्यता मिली तो पूरे क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ पड़ी थी। मेरे यँहा से मुरलीधर कंडवाल जैसे विद्यार्थी ने उस जमाने मे पूरा उत्तर प्रदेश बोर्ड टॉप किया था, और वह ऑर्डिनेंस देहरादून में एमडी के पद से सेवानिवृत्त हुए। मेरे से पहले यँहा पर ब्रिटिश कालीन प्राइमरी स्कूल जो सन 1921 का बना हुआ है और आने वाले 2 साल बाद वह 100 वर्ष की शताब्दी को पूर्ण कर लेगा, मैं भी उसी राह पर चल रहा हूँ।।

 

 

1984 में मुझे एक प्रौढ़ के रूप में 12वी यानी इंटर मीडिएट का दर्जा मिला। तब यँहा पर श्री काशीराम झिलड़ियाल जी पहले प्रधानाचार्य नियुक्त हुए । उनके बाद श्री हरि सिंह चौधरी जी, श्री आनंद सिंह नयाल जी और वर्तमान में डॉ श्री मनोज डबराल जी प्रधानाचार्य जी का दायित्व निभा रहे हैं।
मेरे यँहा बहुत बुद्धिजीवी लोगो ने शिक्षा ग्रहण की, और शिक्षण प्रदान की। जिनमे कुछ का नाम अपनी याद दास्त के रूप में लिख रहा हूँ। जिनमे श्री सुरेंद्र दत्त मारवाड़ी जी, श्री ब्रह्मानन्द शुक्ला जी, श्री जगत सिंह नेगी जी, श्री गिरधारी लाल अमोली जी, श्री आलम सिंह राणा जी, श्री रमेश चन्द्र मारवाड़ी जी, श्री सुरेंद्र दत्त देवलियाल जी, श्री काशीराम झिलड़ियाल जी, श्री हरि सिंह चौधरी जी, श्री आनंद सिंह नयाल जी, श्री रोशन लाल जोशी जी, श्री सतेंद्र खत्री जी, श्री धर्मेंद्र पासी जी जैसे अन्य विद्वत गुरुजनों ने शिक्षा दीक्षा प्रदान की।

मेरे आँगन में देवराना, कचुण्डा, अमोला, धारकोट, मरोड़ा, रामजीवाला, किमसार, जोगियाना, मल्ला बनास, तल्ला बनास, भूमियाकिसार, कसाण, गंगा भोगपुर, तालघाटी कन्डरह, साइकिलवाड़ी आदि अन्य गाँव के हजारों विद्यार्थियों ने शिक्षा ग्रहण की। मेरे आँगन में बॉलीवाल के बहुत चर्चित खिलाड़ी निकले। जब तक मैं युवा था तब मेरे यँहा शिक्षा का जो दीप प्रजवलित हुआ उस समय मैं बहुत प्रसिद्ध हुआ। मेरे लिये समय समय पर सरकार से बजट आया नए कमरे बने लेकिन हालात कभी नही सुधर पाए। जब से सरकार का बजट का भरोसा हुआ तब से मैं और अपंग होता गया।

जब मेरा निर्माण हुआ या जब मैं शैशवावस्था में था तब मेरा देखभाल क्षेत्रीय जनता और अध्यापक लोगो ने किया।। उस जमाने मे झोपड़ी से शिक्षा का दीपक प्रज्वलित करने के लिये लोगो ने तन मन धन से जनसहयोग किया। लालढांग जाने वाले टांडी भवसी से मेरे लिए बल्लियों को कंधों पर ढोया गया, चद्दर कन्डरह से सिर पर लाये गए, स्कूल के लिए फर्नीचर भी विद्यार्थीयो के द्वारा श्रमदान करके वही 7 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई कन्डरह से चढ़कर लाया गया। उस जमाने मे 1 रुपये से लेकर 1000 रुपये तक का चंदा इकठ्ठा करके मुझे आकार दिया गया। उसके बाद मुझे प्रबंधन समिति के अधीन कर दिया गया। प्रबंधन समिति के प्रबंधकों द्वारा अपने समयानुसार मेरे लिये प्रयास किया गया उनका आभार व्यक्त करता हूँ। लेकिन बाद में मैं राजनीति का भेंट चढ़ता चला गया। एक जमाने में जँहा मेरे आँगन में 300 से 500 बच्चों ने शिक्षा ग्रहण की आज 150 बच्चो के लिये तरस रहा हूँ। मेरे यँहा जँहा कभी गुरुजनों का एक नाम होता था, आज उनके सेवानिवृत्त होने के बाद स्थायी नियुक्ति के लिए तड़प रहा हूँ, मेरी कराह को कोई नही सुन पा रहा है। मेरे यँहा की पढ़ाई और गुरुजनों का अनुशासन पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध था। श्री नयाल जी का रुतवा आज तक सभी विद्यार्थियों के जेहन में आज भी ताजा होंगी। इसी तरह हर अध्यापक का अपना एक विशेष गुण था जो शिक्षा के अलख को जगाने में बहुत सजगता से काम करता था। ऐसा नही है कि मेरे यँहा उद्दंड विद्यार्थी नही रहे, लेकिन पढ़ने में भी होशियार रहे।

 

 

आज मैं लगभग 56 साल का अधेड़ हो गया हूँ, आज मेरा शरीर बूढ़ा हो गया है, मेरा रंग उड़ गया है, जगह जगह से टूट गया हूँ, बिखर सा हुआ हूँ, और अन्दर से तो खोखला हो चुका हूँ, बस मेरे गोद में अभी भी कुछ बच्चे अपने भविष्य के सपनो को बुन रहे हैं, उनके लिये खड़ा हूँ, वरना कई बार तो इंसान कहने वाले लोगो से इतना खिन्न हो गया हूँ कि बस अभी मुक्ति पा लू, का मन होता है, लेकिन मुझे विद्या का घर या सरस्वती का आवास कहा जाता है उनके लोक लाज से सिसकारी भरकर जी रहा हूँ।

मनखि तेरी कलम को भी धार मैंने ही दी थी, लेकिन तुम्हारी कलम भी मेरी स्थिति को लिखने में देर कर रही थी, आज खुशी हुई कि तुमने मेरा दर्द और खुशी को उकेरा। आज मैं अपनी कुछ ख्वाईश बता देता हूँ।

सबसे पहले तो मेरे आँगन में शिक्षा का दीप निरन्तर प्रज्वलित हो इसके लिये कुशल अध्यापको की नियुक्ति की जाय। दूसरा मेरे भवन की जगह जगह दीवारें उखड़ गयी हो उनकी मरहम पट्टी की जाय। मैं आज उस बेगानी हवेली की तरह बिरान सा लग रहा हूँ, क्योकि मेरा रंग उतर चुका है। आज भी मेरे यँहा पर 12वी में विज्ञान की शिक्षा की कोई व्यवस्था नही है जिस कारण मेरे आँगन से होनहार विद्यार्थी सुकून की दुनिया छोड़कर चकाचौंध की तरफ जा रहे हैं।

मैं समस्त उन भूत पूर्व विद्यार्थियों और समाज के उन चेतन नागरिकों से अनुरोध करूंगा जिन्होंने मेरी गोद मे शिक्षा ग्रहण की है, और आज अच्छे पदों पर बैठे हैं, वह मेरी सुधि ले। मैं सरकार के भरोसे कम और आप लोगो के भरोसे पर हूँ, उम्मीद करता हूँ कि आप इस अधेड़ उम्र के स्कूल की मदद जरूर करोगे। क्योकि मुझे तो हमेशा लोगों का प्यार ही मिला है लोगो ने ही सींचा है, बड़ा बनाया है, और यह कहने लायक बनाया है। मनखि तुमने आज मेरे दिल का दर्द पन्नो पर उकेरा है, आज खुशी हुई है। इसी उम्मीद के साथ फिर कभी अपनी बात कहूंगा।

आपका अपना इंटर कॉलेज किमसार यमकेश्वर,पौड़ी गढ़वाल।

हरीश कंडवाल मनखी की कलम से।